Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
रोमियों 11:1 रोमियों 11:2 रोमियों 11:3 रोमियों 11:4 रोमियों 11:5 रोमियों 11:6 रोमियों 11:7 रोमियों 11:8 रोमियों 11:9 रोमियों 11:10 रोमियों 11:11 रोमियों 11:12 रोमियों 11:13 रोमियों 11:14 रोमियों 11:15 रोमियों 11:16 रोमियों 11:17 रोमियों 11:18 रोमियों 11:19 रोमियों 11:20 रोमियों 11:21 रोमियों 11:22 रोमियों 11:23 रोमियों 11:24 रोमियों 11:25 रोमियों 11:26 रोमियों 11:27 रोमियों 11:28 रोमियों 11:29 रोमियों 11:30 रोमियों 11:31 रोमियों 11:32 रोमियों 11:33 रोमियों 11:34 रोमियों 11:35 रोमियों 11:36



पाठ का तात्पर्य तुरंत
रोमियों 11:7 में कहा गया है कि इस्राएलियों में से जो खोज करते हैं, वे उसे नहीं पाते; परन्तु जो चुन लिए गए वे पाए जाते हैं और बाकी सब कठोर बन जाते हैं। सरल शब्दों में: ईश्वर के चयन के अनुसार परमेश्वर कुछ लोगों को विशेष रूप से विश्वास की ओर बुलाते हैं, शेष पर कठोरता बनी रहती है ताकि लक्ष्य—आम, सभी के लिए उद्धार की योजना—पूर्ण हो सके.
पार्श्वभूमि और संदर्भ
यह पाद हल्के में नहीं; रोमियों की किताब में पौराणिक-इतिहासिक-एहंकारी ढंग से इस्राएल का मुद्दा है: क्या यहूदियों के लिए उद्धार की योजना बंद हो गई है या उन पर भी उद्धार संभव है? पैसाच के समय से ईश्वर ने राष्ट्र के रूप में यहूदियों को चिह्नित किया, परन्तु नाटक यह है कि चित्ताभि-चयन के अनुसार कुछ यहूदी, और बहिर्गमन से कुछGentiles भी—परमेश्वर की योजना के अनुसार—आकाशीय वरदान पाएंगे। यहां “चुनें गए” वे हैं जो विश्वास के माध्यम से उद्धार के लाभ में भाग लेते हैं; “बाकी कठोर हुए” वे लोग हैं जिनके लिए अभी भी ईश्वर की कठोरता बनी रहती है ताकि समय आने पर सत्य का उद्घाटन हो।
interpretive observations
संक्षिप्त थीमेटिक सूची
क्रॉस-रेफरेंस और उनके संक्षिप्तExplanation
कथन से सहायक सुराग के रूप में ये संदर्भ रहते हैं:
इन संदर्भों के संकेत दिखाते हैं कि चयन, विश्वास और उद्धार का संदेश एक व्यापक योजना का हिस्सा हैं—जो दुनिया के हर कोने तक पहुँचती है।
सूक्ष्म व्यावहारिक निष्कर्ष
हम समझ लें कि ईश्वर के चयन और हमारे विश्वास के बीच संतुलन है। यहूदियों के ऐतिहासिक अनुभव से यह सीख मिलती है कि प्रभु की योजना कभी एक-रास्ता नहीं, बल्कि धोरणों के समूह के साथ संचालित होती है। इसलिए हमें निराश नहीं होना चाहिए यदि हमारा अनुभव तुरंत उद्धार की रोशनी नहीं देता; प्रतिक्षा में भी भगवान की करुणा प्रचलित है, और विश्वास बनाए रखें।
महत्वपूर्ण उद्धरण (public-domain से) और संदर्भ
नीचे उद्धरण केवल संकेतस्वरूप हैं; पूर्ण पाठ उद्धरण नहीं किया गया है:
यह पंक्तियाँ समकालीन टिप्पणीकारों के सार को प्रतिनिधित्व करती हैं, जिसमें चयन और कठोरता की भूमिका को समझाने के लिए मथ्यू हेनरी, एल्बर्ट बर्न्स, एडम क्लार्क आदि के दृष्टिकोण मिलते हैं (परिशिष्ट पर्यवेक्षण):
मूर्त उद्धरण (exact) जिनसे विचार मिलते हैं:
“चयन के अनुसार ही विश्वास प्राप्त होता है, और शेष पर कठोरता स्थित रहती है।”
नोट: नीचे विशिष्ट उद्धरण छोटे हैं और मूल पाठ से संकेत मात्र देने के लिए है:
चर्चा के स्रोत के तौर पर पारिवारिक टिप्पणी के संकेत
यदि चाहें तो 1) मैथ्यू हेनरी के विचार, 2) एल्बर्ट बर्न्स, 3) एडम क्लार्क के टिप्पणियाँ संकेतस्वरूप देखें। इनमें से कुछ वाक्यांश अलग-अलग जगहों पर उद्धृत मिलते हैं, पर यहाँ सार यही है कि चयन-विश्वास और कठोरता का प्रश्न ईश्वर की सर्व-व्यापक योजना का भाग है।