Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
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रोमियों 11:25 का महत्व और संदेश
यह पद अत्यंत स्पष्ट शब्दों में बताता है कि परमेश्वर की योजना में अभी भी एक आख़िरी प्रगति-चक्र बाकी है—यानी अन्यजातियों का प्रवेश पूरी रीति से होकर ही रहेगा, तब तक ईश्वर का चयनित राष्ट्र इस्राएल कठोर दीख सकता है। पाठक के लिए यह प्रश्न उठता है: क्या मैं अपने आप को बुद्धिमान समझकर यह मान लूं कि परमेश्वर की योजना मुझे छोड़ चुकी है? पवित्र शास्त्र में विश्वास के साथ यह चेतावनी है कि हम न तो अपनी बुद्धि पर ठहरें और न सोचें कि हमारे समय-सारिणी में सब कुछ स्पष्ट है; क्योंकि ईश्वर की योजनाएं श्रृंखलाबद्ध क्रम में घटित होती हैं, और किसी भी पक्ष को अबूझ बनाते हुए दूसरे पक्ष का समय आता है।
पद का मूल संदर्भ
रोमियों का यह भाग पॉल के प्रेरित-वचन का हिस्सा है जिसमें ईश्वरीय योजना-निर्देशन स्पष्ट किया गया है—यहूदियों की अस्वीकृति के पीछे की परमेश्वर की दीर्घसूत्री योजना और प्रभु की अनुकम्पा-गति उभरकर सामने आती है। इस समय रोम में ईसाई समुदाय के लिए एक जागरूक संदेश है: ईश्वर की अगुआ सूची में अन्यजातियों का प्रवेश, और यहूदी उपेक्षित रहने के बजाय, एक पूर्णता-क्रम का भाग है।
मुख्य संदेश
निहित विषय-धाराएं
यह उपदेश तीन प्रमुख धारणाओं को मिलाकर देता है: आपसी उद्धार में गैर-हिंसा और दया-निर्भरता; परमेश्वर की दृष्टि में समग्र योजना के प्रति विश्वास; तथा यहूदी-चेतना के बावजूद विश्वास में समता। यह सीधा संदेश देता है कि ईश्वर की योजना का भागीदार बनने के लिए हमें धैर्य, नम्रता, और विनम्रता से खड़ा रहना चाहिए।
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप में)
- रोमियों 9–11 में उसी विषय की विस्तृत चर्चा मिलती है: ईश्वर की चयन-योजना में यहूदियों और अन्यजातियों के क्रमिक प्रवेश का विवेचन।
- रोम 11:11–12—क्या इसका आशय है कि अन्यजातियाँ चढ़ेगी परन्तु ईश्वर की धरोहर स्थिर रहेगी? यह संदेश धैर्य और आश्वासन देता है।
- रोम 15:18–20—पवित्रशास्त्र बताता है कि ईश्वर के उद्धार-कार्य की गिनती केवल परमेश्वर की कृपा से है, न कि मानव की बुद्धि से।
पवित्र-लेखन से संक्षिप्त सहायता
माथ्यूहenery, बर्न्स और क्लार्क के पार्श्व-मतों से संक्षिप्त बातों का समापन इस प्रकार है:
- Matthew Henry: यह चेतावनी इस बात का संकेत है कि परमेश्वर की योजना के एक हिस्से की कठोरता तब तक बनी रहती है जब तक के हम उसकी पूरी योजना के दृश्य को नहीं देखते, और यह हमें नम्र बनाये रखती है कि उद्धार का पूर्ण लाभ केवल विश्वास से आता है।
- Albert Barnes: यह門 स्पष्ट करता है कि ग़लत समझ से बचना—स्व-उद्धार का विचार छोड़कर, यहूदियों और अन्यजातियों के बीच ईश्वर की व्यवस्था में क्रम बनाये रखना चाहिए।
- Adam Clarke: इस वचन से यह दिखता है कि आरम्भ से ही यहूदियों की निश्चित दृष्टि के साथ-साथ अलग-थलग नहीं, बल्कि परमेश्वर की दया के अनुसार सभी के लिए उद्धार की राह खुली है; कठोरता एक चरण है न कि अंतिम स्थिति।
देवotional reflection
हम में से कौन यह नहीं चाहेगा कि हमारे जीवन के मार्ग में सबसे सहज और स्वच्छ उत्तर मिल जाए? परन्तु यह पाठ सिखाता है कि ईश्वर की योजना की दिशा में हमारा भाग वही है जो विश्वास, धैर्य और विनम्रता से जुड़ा है। जब हम अपने आप को संभवतः “समझदार” मान लेते हैं तो हम यह भूल जाते हैं कि हमारा सुरक्षा-बंधन परमेश्वर के साथ है, न कि हमारी समझ के साथ। इसलिए तीन बातें याद रखें: प्रभु की योजना पूरी होने दें, दूसरों के साथ लोच और विनम्रतायुक्त प्रेम दिखाएं, और धैर्य से प्रतीक्षा करें कि वह कब और कैसे अपने उद्धार की महान योजना पूरी करे।