Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
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रोमियों 11:20 – वचन का अर्थ और संदर्भ
पद रोमियों 11:20 में प्रेरित पौलुस ईश्वर की अनुकम्पा और मानवता की स्थिति को दर्शाते हैं। यह अनुभाग, जहां पौलुस यह स्पष्ट करते हैं कि यहूदियों के अविश्वास के कारण वृक्ष ने शाखाओं से अलग कर दी गईं, और अगर कट लिए गए भाग सत्य-विश्वासी रहते हैं, तो वही स्थिति “तुम विश्वास से बने रहते हो” के साथ है। यह संदेश यह है कि परमेश्वर की योजना पूरी तरह से उद्धार के क्रम पर आधारित है: अविश्वास से गिरा हुआ हिस्सा मुक्त हुआ या समाप्त नहीं, बल्कि वह विश्वास के द्वारा बने रहने पर आश्वस्त हो सकता है। इस संदर्भ में, हमारा उद्देश्य यह जानना है कि हम कैसे भक्तिपूर्वक, भय मानकर और विनय से बने रहना सीखें।
मुख्य अर्थ
पौलुस यह कहते हैं कि ईश्वर ने अविश्वासी हिस्सों को भंग कर दिया है, ताकि विश्वास से रहने वाले सदस्यों की सुरक्षा साबित हो सके। यदि तुम विश्वास से बनें रहने पर टिके रहते हो, तो अभिमान रखना उचित नहीं; बल्कि तुम्हें भय मानना चाहिए कि तुम भी भटक सकते थे और केवल कृपा से स्थिर हो सके हो। यह एक दायित्वपूर्ण आत्म-निरीक्षण है—हम अपनी स्थिति में स्थिर रहें, न कि दूसरों पर घमण्ड करें।
दो-तीन प्रमुख विषय
संबंधित पंक्तियाँ
– रोमी 9:22-23: परमेश्वर की लचीलापन और उद्देश्य—क्यों कुछ का बहिष्कार और कुछ का आमंत्रण। यह भी दिखाता है कि नर-नाजायज़ी से बचना कैसे उचित है।
– यूहन्ना 15:4-5: לבין टिके रहना—आते-जाते जीवन में निर्भर रहने का महत्व।
– 1 कुरिन्थियों 10:12: जोया हुआ न समझे कि वे कभी गिरेंगे नहीं; खतरे के समय सचेत रहना।
विस्तारपूर्ण व्यावहारिक चिंतन
हम यह मान लें कि ईश्वर की कृपा बिना प्रयास के नहीं मिलती। अगर आप विश्वास में नहीं रहते, तो आप भी कट सकता था। फिर भी यह परमेश्वर की दया की परीक्षा है: क्या हम भय और विनय के साथ स्थिर हैं? दैनिक विश्वास-यात्रा मेंloga, हमें आस्था को न भूले रखना, कष्ट में भी परमेश्वर की कृपा पर निर्भर रहना, और किसी भी समय अपने स्वयं के अभिमान से ऊपर नहीं उठना सीखना चाहिए।
संक्षिप्त निचोड़
इस Verse के द्वारा सिखाया गया है कि अविश्वास से च्युत हुए लोग भी परमेश्वर की कृपा से बुलाए जाते हैं और जो विश्वास में टिके रहते हैं, वे अभिमान से मुक्त होकर भय के साथ प्रभु के मार्ग में बने रहते हैं। यह हमारी आत्मा के लिए एक सतर्क संकेत है: हम केवल ईश्वर की कृपा पर टिके रहने की राह चुनें, और अपने विश्वास को पूरी तरह जीवित रखें।
Cross-reference (संकेतित व्याख्या)
रोमियों 11:21-22: अन्यायपूर्ण अभिमान से सावधान रहें; अन्यथा आप भी काटे जा सकते हैं यदि आप न तो दया दिखाते हैं न दृढ़Faith. यह संकेत देता है कि दया और क्रमिक चेतना एक साथ चलनी चाहिए।
यशायाह 28:16: विश्वास की नींव पर बोझ नहीं, बल्कि स्थिरता के लिए पत्थर—यह बात भगवान की सुरक्षा के बारे में बोलती है।
कई प्रसिद्ध पंडितों के संकलनों से जो उल्लेख मिलते हैं, उनमें से एक-एक कथन इस प्रकार हैं: “जो विश्वास में बन रहता है, वह अभिमान से नहीं, भय से प्रेरित रहता है।”