Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
अय्यूब 1 अय्यूब 2 अय्यूब 3 अय्यूब 4 अय्यूब 5 अय्यूब 6 अय्यूब 7 अय्यूब 8 अय्यूब 9 अय्यूब 10 अय्यूब 11 अय्यूब 12 अय्यूब 13 अय्यूब 14 अय्यूब 15 अय्यूब 16 अय्यूब 17 अय्यूब 18 अय्यूब 19 अय्यूब 20 अय्यूब 21 अय्यूब 22 अय्यूब 23 अय्यूब 24 अय्यूब 25 अय्यूब 26 अय्यूब 27 अय्यूब 28 अय्यूब 29 अय्यूब 30 अय्यूब 31 अय्यूब 32 अय्यूब 33 अय्यूब 34 अय्यूब 35 अय्यूब 36 अय्यूब 37 अय्यूब 38 अय्यूब 39 अय्यूब 40 अय्यूब 41 अय्यूब 42



अय्यूब 8:20 – Immediate setting
यह पद आयूब की मित्रों की निंदा-समाधानों के बीच आता है। बिलदैद का कथन है कि परमेश्वर न तो खरे मनुष्य को निकम्मा जानकर छोड़ देता है, न बुराई करने वालों को संभालता है। यह विचार एक प्रमाण-आधार है कि दुष्टों के विरुद्ध परमेश्वर की न्याय-निर्णय के बिना कुछ भी नहीं होता; बल्कि जो मनुष्य ईमानदारी से परमेश्वर के साथ चलता है, उसे उसका संरक्षण और आशीर्वाद प्राप्त होता है।
ईश्वर और विश्वास के बारे में पाठ से मिलने वाले संकेत
इस वाक्य से स्पष्ट होता है कि परमेश्वर निष्क्रिय नहीं है; वह न तो सज्जन को भी छोड़ देता है और न ही पापियों को दया-संतुलन से ऊँचा रखता है। यह पद बताता है कि परमेश्वर के निर्णय में नैतिकता, सत्य-चेतना और आचरण का योग 중요 है। यदि कोई व्यक्ति ईमानदारी से धर्म के अनुसार चलता है, तो परमेश्वर उसका समर्थक और संरक्षक रहता है; इसके विपरीत, यदि वह शरारत और पाप में डूबा रहता है, तो परमेश्वर उसे संभालने में असफल रह सकता है।
महत्वपूर्ण शब्दों और चित्रों की स्पष्ट व्याख्या
अन्य संदर्भ (Cross-references) और उनका संक्षिप्त अर्थ
- लोकगीतों जैसी धारणा से हटकर आस्था के दायरे में, वास्तविकता यह है कि परमेश्वर दृढ़-विश्वासियों को न सम्मानित करता है और न असहाय छोड़ता; अन्य जगह भी कहा गया है कि जो ईमानदारी से डर कर रहते हैं, परमेश्वर उन्हें सुरक्षित रखेगा।
- बाइबल में परमेश्वर का निश्चय दोनो ओर है: कृपा-निष्ठता और न्याय-आक्रमण; इसका संतुलन विश्वसनीय विश्वास और धैर्य से परिचित कराता है।
- न्याय का पूरा कानून पाप पर लागू होता है, तथा धर्मी पर कृपा के साथ संरक्षण भी मिलता है।
इन संदर्भों से यह स्पष्ट होता है कि परमेश्वर के साथ व्यवहार में ईमानदारी और नम्रता रखें; असत्य और धूर्तता से बचना चाहिए, ताकि हमारे जीवन में उसका सहारा बना रहे।
आज के जीवन में अनुप्रयोग
- कठिन परिस्थितियों में भी विश्वास बनाए रखें: यहविद्य है कि परमेश्वर दयालु और न्यायी है; वह सत्य-पथ पर चलने वालों को नहीं छोड़ता।
- संकट के बीच ईमानदार निर्णय लें: अगर आप कठिन समय में हों, तो गलत रास्ते अपनाने के बजाय परमेश्वर के मार्ग पर टिके रहें।
- दूसरों के साथ न्यायपूर्ण जीवन जीएँ: क्योंकि परमेश्वर उन लोगों की रक्षा करता है जो सत्य और नैतिकता के साथ चलते हैं, हमें भी समानता, दया और प्रामाणिकता दिखानी चाहिए।
सार-संयोजन
बोल उठता है कि परमेश्वर खरे मनुष्यों को छोड़ता नहीं और बुराई करने वालों को अपने कर्मों के अनुरूप उचित परिणाम देता है। यह विचार विश्वास की स्थिरता बनाये रखने का आग्रह है: ईमानदार और विनम्र होकर परमेश्वर के साथ जीवन बिताने पर उसका संरक्षण और आशीर्वाद मिलता है; अन्यथा, दुष्टताओं के चलते परिस्थितियाँ बदलती-दिखती हैं।
नोट: नीचे कुछ प्रेरक विचारधारा के प्राचीन टिप्पणीकारों से संक्षेप उद्धरण– यदि उपलब्ध हों—संदर्भित किए गए हैं:
Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के समान विचारधारा के अभिन्न संकेत सामान्य रूप से इस प्रकार होते हैं—परमेश्वर के न्याय और कृपा के संतुलन, और वास्तविक नैतिकता के आधार पर चालक-समर्थन।