Old Testament
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यूहन्ना 9:1 यूहन्ना 9:2 यूहन्ना 9:3 यूहन्ना 9:4 यूहन्ना 9:5 यूहन्ना 9:6 यूहन्ना 9:7 यूहन्ना 9:8 यूहन्ना 9:9 यूहन्ना 9:10 यूहन्ना 9:11 यूहन्ना 9:12 यूहन्ना 9:13 यूहन्ना 9:14 यूहन्ना 9:15 यूहन्ना 9:16 यूहन्ना 9:17 यूहन्ना 9:18 यूहन्ना 9:19 यूहन्ना 9:20 यूहन्ना 9:21 यूहन्ना 9:22 यूहन्ना 9:23 यूहन्ना 9:24 यूहन्ना 9:25 यूहन्ना 9:26 यूहन्ना 9:27 यूहन्ना 9:28 यूहन्ना 9:29 यूहन्ना 9:30 यूहन्ना 9:31 यूहन्ना 9:32 यूहन्ना 9:33 यूहन्ना 9:34 यूहन्ना 9:35 यूहन्ना 9:36 यूहन्ना 9:37 यूहन्ना 9:38 यूहन्ना 9:39 यूहन्ना 9:40 यूहन्ना 9:41



यूहन्ना 9:24 पर वक्तव्य: फिर उन्होंने उसे दूसरी बार बुलाकर कहा, “परमेश्वर की स्तुति कर; हम तो जानते हैं कि वह मनुष्य पापी है।”
यह पद यूहन्ना के Gospel का एक छोटा-सा दृश्य है जिसमें अंधे को चखी गई चश्मदीद-गवाही के बाद भी लोग उसकी पहचान और प्रेरणा पर संदेह जता रहे हैं। अध्याय 9 में यीशु ने दृष्टिहीन पुरुष के चश्मे के माध्यम से दिव्य शक्ति दिखलाई; यहाँ विरोधी समूह उसकी तत्कालीन कृपा को चुनौती देते हैं और उसे परमेश्वर के स्थान पर अपनी धार्मिक पहचान पर टिके रहने के लिए प्रोत्साहन देते हैं—परमेश्वर की स्तुति करने को कहते हैं, क्योंकि वह पापी है।
पद का छोटा overview
इस बिंदु पर लेखनी यह दिखाती है कि सामाजिक दबाव और परिभाषित धार्मिक मान्यताओं के पीछे कितनी सख्त धारणाएं थीं। मिसाल के तौर पर लोग मानते थे कि यदि किसी का चमत्कार प्रमाणित है, तो उसकी प्रेरणा पवित्र होगी; किन्तु यहाँ पर उनका निष्कर्ष गलत ठहरता है—वे लोग स्वयं-अधिकारपूर्वक निर्णय लेते हैं कि कौन पापी है।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
पहला पाठ यह कि सत्य को स्वीकार करने के लिए दृष्टि और श्रद्धा चाहिए — भले ही अन्य लोग उसे गलत ठहराएं। दूसरा पाठ यह कि दया और प्रमाण के बीच अस्थिरता दिखाई देती है: वे लोग दूसरे के प्रति नीति-नियम लगाते हैं, परन्तु स्वयं परमेश्वर की स्तुति नहीं करते। यीशु के चमत्कार से जो सत्य उभरकर आता है, वह यह कि परमेश्वर के काम में भाग लेने वाले लोग उसकी महिमा कराते हैं, न कि उसे बदनाम।
पवित्र ग्रंथों के समान प्रासंगिक संदर्भ
धर्मशास्त्रीय दृष्टिकोण—संक्षेप में
हिन्निर्व अनुवाद में जो भाव सामने आते हैं, वे यह संकेत करते हैं कि धार्मिक सुधार का मार्ग सत्य के साथ है, न कि दूसरों के अनुमानों से। Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के उद्धरण इस दृश्य को समझाते हुए दिखाते हैं कि चमत्कारिक चमत्कार-स्थिति में भी सार्वजनिक बहस में सत्य की कसौटी क्या होनी चाहिए।
Matthew Henry के संक्षिप्त विचार (सूत्र के तौर पर): “जो वास्तव में धारणाओं के अनुरूप नहीं चलते, वे सार्वजनिक रीति-रिवाज के भीतर परमेश्वर की महिमा को नहीं मानते।” (सारांश)
Albert Barnes का अवलोकन: लोग मानते हैं कि गुरु पापी है क्योंकि वे अपनी मान्यताओं के अनुसार निर्णय लेते हैं; परन्तु ईश्वर के कर्म से सत्य उजागर होता है, न कि मानव आलोचना से।
Adam Clarke का सार: इस घटना से यह दिखता है कि धार्मिक दृष्टिकोण कितने बार मानवीय पूर्वाग्रहों से बाधित होते हैं; परन्तु परमेश्वर की स्तुति और उसकी महिमा का लक्ष्य ही सच्चे चमत्कार की पहचान है।
व्यावहारिक अनुप्रयोग
छोटा-सा सार
इस अंश का मूल संदेश है: सत्य की परीक्षा में परमेश्वर की महिमा सर्वोपरि है; मानव अधिकार और मान्यताओं की सीमाओं के भीतर भी ईश्वर का काम हो सकता है जिसे स्वीकार करना चाहिए और उसकी स्तुति करना आवश्यक है।
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेपित)
यूहन्ना 9:3—चमत्कार के पीछे ईश्वर की योजना; प्रेरितों के कार्य 4:20—विश्वास और साक्षी बनना; यशायाह 45:3—महिमा के संदर्भ में परमेश्वर का राज्य।