Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
लैव्यव्यवस्था 1 लैव्यव्यवस्था 2 लैव्यव्यवस्था 3 लैव्यव्यवस्था 4 लैव्यव्यवस्था 5 लैव्यव्यवस्था 6 लैव्यव्यवस्था 7 लैव्यव्यवस्था 8 लैव्यव्यवस्था 9 लैव्यव्यवस्था 10 लैव्यव्यवस्था 11 लैव्यव्यवस्था 12 लैव्यव्यवस्था 13 लैव्यव्यवस्था 14 लैव्यव्यवस्था 15 लैव्यव्यवस्था 16 लैव्यव्यवस्था 17 लैव्यव्यवस्था 18 लैव्यव्यवस्था 19 लैव्यव्यवस्था 20 लैव्यव्यवस्था 21 लैव्यव्यवस्था 22 लैव्यव्यवस्था 23 लैव्यव्यवस्था 24 लैव्यव्यवस्था 25 लैव्यव्यवस्था 26 लैव्यव्यवस्था 27Verse
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लैव्यव्यवस्था 15:15 — यजक की पावनता और पाप-बलि
यह पद योग्यता और उपचार का नियम बनाते समय व्यक्तिगत अशुद्धि के कारण होते पाप-सम्बन्धी स्थिति के बारे में है। यहाँ जो लिखा गया है वह बताता है कि यौन-प्रमेह जैसे अशुद्ध-आचरण के परिणामस्वरूप समुदाय के भीतर पवित्रता कैसे पुनः स्थापित की जाती है, और परमेश्वर की पवित्रता के अनुरूप व्यक्ति को कब और कैसे दोष-हटाने का अवसर मिलता है।
वस्तुस्थिति का सेटिंग: पाप और पवित्रता का क्रम
प्राप्त पाठ में विशिष्ट यह है कि प्रमेह (यौन-सम्बन्धी अशुद्धि) के कारण एक व्यक्ति को यह व्यवस्था दी जाती है कि वह आधी-यज्ञ के दो भागों में से एक को पापबलि और दूसरे को होमबलि के लिये चढ़ाए। याजक then उसे, यहोवा के सामने, प्रमेह के कारण प्रायश्चित करते हैं। यह प्रक्रिया संकेत करती है कि अशुद्धि के कारण व्यक्ति पहले चिह्नित दायरे में आता है, फिर साधन-बलि से उसकी स्थिति सुधार और पवित्रता की पुष्टि संभव होती है।
ईश्वर और विश्वास के बारे में पाठ से मिलने वाले संकेत
यहाँ ईश्वर की holiness और उनके साथ समाज की संबंध-निर्माण प्रमुख है। याजक की भूमिका एक मध्यस्थ की है—यानी वे परमेश्वर और मनुष्य के बीच पवित्रता के उपचार का माध्यम बनते हैं। यह बताता है कि पाप-बलि और होमबलि क्रमबद्ध रूप से पाप के कारण बिगड़े संबंधों को फिर से स्थापित करने के लिये आवश्यक हैं।
मुख्य शब्द-चित्र और भावार्थ स्पष्टीकरण
अन्य पाठों से सम्बद्ध संकेत
इस विषय में प्रेरणा के लिये निम्न सम्बद्ध आयतें मददगार हो सकती हैं — उनके भीतर पाप-प्रायश्चित्त और भगवान के पवित्र प्रवेश की प्रक्रिया स्पष्ट होती है:
आज के ध्यान और व्यवहार
आज के विश्वास-जीवन में यह पाठ हमें सिखाता है कि पाप से चुकौती केवल व्यक्तिगत अहित से नहीं, बल्कि परमेश्वर के साथ संबंध के पुनर्स्थापन से है। यदि हम किसी आचरण से अक्षम हों, तो मन-धड़के के साथ याजक के रूपक-उद्धार की दिशा नहीं छोड़नी चाहिए; बल्कि हमारे देव-आस्था में ईमानदारी और समर्पण के साथ क्षमा की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। यह भी याद रहे कि पवित्रता के लिए मध्यमस्थ के तौर पर समुदाय के नेता और आध्यात्मिक मार्गदर्शक की भूमिका अब भी महत्वपूर्ण है, हालांकि हमारा सीधा पहुँच परमेश्वर के mercy में है।
यह पाठ Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-डायसन-टिप्पणियों के संग-संग एकीकृत विवेचना की नर्मी में प्रस्तुत है, जिसमें संक्षिप्त उद्धरण और उनके विचारों का essence समाहित किया गया है:
Matthew Henry: “The Lord’s mercy and his justice have, in various rites, provided a way for the restoration of those that have suffered by sin.”
Albert Barnes: “The law here teaches that atonement for impurity is not merely ceremonial but aims at cleansing the conscience and re-establishing fellowship with God.”
Adam Clarke: “A particular kind of sin is here specified, whereby inclusive purification is required, and the priest stands as the instrument of God to apply that cleansing.”
इन विचारों के साथ, यह प्रायश्चित्त-योजना एक ऐसी चर्म-रेखा है जो पवित्रता के साथ नयी life-commitment चाहती है—जो आज भी हमारे विश्वास में देहाती और आध्यात्मिक दोनों स्तरों पर गुनगुनाती रहती है।