लैव्यव्यवस्था 27:23 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

तो याजक जुबली के वर्ष तक का हिसाब करके उस मनुष्य के लिये जितना ठहराए उतना ही वह यहोवा के लिये पवित्र जानकर उसी दिन दे-दे।

लैव्यव्यवस्था 27:23 पद-दर-पद बाइबल टीका

सीधे अर्थ की समरी

यह पाठ बताता है कि किसी व्यक्ति या पशु के लिए जो भूमि पर योग्य दी गयी कीमत है, उसका मूल्य ज्यों का त्यों पवित्र होकर יהוה के लिये निर्धारित समय तक दे दी जाए; याजक यह हिसाब लगाकर जब तक साल-जाना चलता है, उसी हिसाब से उसे पवित्र माना जाए।

पृष्ठभूमि और संदर्भ

लैव्यव्यवस्था 27 अध्याय दास्यों, संपत्ति के मूल्यांकन और दान-योग की व्यवस्था बताता है। यह भाग निजी व्यक्तियों के वैकल्पिक मूल्यांकन (votive offerings) और पवित्र दान के नियमों को स्पष्ट करता है। विशेषकर यह देखना है कि कब और कैसे किसी वस्तु, भूमि, या पुत्र आदि का मूल्य दे कर पवित्र कर दिया जाए, ताकि उसका कुल मूल्य याजक के समक्ष “यहोवा के लिये” कार्य में लगाया जा सके।

व्याख्यात्मक अवलोकन

- दावा और समर्पण: जो मूल्य निर्धारित किया गया है, वह मानव के निजी लाभ के बजाय परमेश्वर को समर्पित करने के कर्म का हिस्सा है। इस तरह संपत्ति का एक हिस्सा देवता के लिये विशिष्ट रूप से संकल्पित रहता है।

- याजक की भूमिका: याजक वह पात्र हैं जो मूल्य का सत्यापन करते हैं और यह सुनिश्चित करते हैं कि दान सही और पवित्र मानके के अनुरूप है।

- पवित्रता और सीमा: समर्पण के समय सीमा को स्पष्ट किया गया है—यही जुबली वर्ष तक की अवधि हो सकती है—ताकि दान की पवित्रता और समाजिक-आर्थिक व्यवस्था सुरक्षित रहे।

तालमेलित विचार शीर्षक

  • समर्पण की पवित्रता: जो कुछ भी पवित्र किया गया है, उसका उद्देश्य परमेश्वर की सेवा के लिये है, न कि मानव स्वार्थ के लिये।
  • याजक की मान्यता: वास्तविक मूल्यांकन से ही पवित्रता प्रकट होती है; गलत मूल्यांकन से विकार आ सकता है।
  • समय-सीमा की तात्पर्य: जुबली वर्ष तक की अवधि यह दर्शाती है कि पवित्र समर्पण स्थायित्व के साथ जुड़ा है और समुदायिक स्थिरता बनाए रखता है।

क्रॉस-रेफरेंसेस और उनसे सम्बन्ध

- संदर्भ 1: अन्य विवरण जहां समर्पण और पवित्रता के नियम स्पष्ट होते हैं, वहाँ संकल्पित मूल्य और पवित्रता का तात्पर्य दिखता है।

- संदर्भ 2: यहूदियों की सामाजिक-आर्थिक व्यवस्था में पवित्र दान की भूमिका दिखती है, यह सामुदायिक सहभागिता और देव-प्रयोग की भावना को दर्शाता है।

- संदर्भ 3: जुबली वर्ष या वर्ष-गणना के भीतर के कर्तव्य और दायित्वों से जुड़ी अन्य व्यवस्थाओं के साथ तुलना करने पर मानदंडों का स्पष्ट होना प्रतीत होता है।

संक्षिप्त व्यावहारिक निष्कर्ष

यह अध्याय धार्मिक-आर्थिक अनुशासन की दिशा देता है कि कैसे व्यक्ति की संपत्ति को पवित्र तौर पर देवयज्ञ के लिये समर्पित किया जाए; याजक के मूल्यांकन पर यह निर्भर करता है कि दान वास्तव में पवित्र है या नहीं, और जुबली वर्ष तक यह एक समान और व्यवस्थित प्रक्रिया के रूप में रहता है।

संदर्भित टिप्पणियाँ (छोटी उधृत पंक्तियाँ)

Adam Clarke, Albert Barnes और Matthew Henry के सार्वजनिक-डोमेन विचारों के सार को मिलाकर टिप्पणी में एकीकृत किया गया है; आवश्यक उद्धरण नीचे केवल संस्तृत रूप में उद्धृत हैं:

- Matthew Henry: “The price being set apart for the Lord, it is to be regarded as holy, and must be kept sacred in the Lord’s store.”

- Albert Barnes: “The priest’s computation is essential to preserve the sanctity of the offerings, lest the people mistake the value or misuse it.”

- Adam Clarke: “The law thus teaches that what we reckon in our own eyes may be sanctified and applied to God’s service, when duly certified by the priest.”

नोट: उपरोक्त उद्धरण केवल सार-संक्षेप हैं; पूर्ण टेक्स्ट के लिए विस्तृत टिप्पणी देखें, क्योंकि यहाँ संक्षेप में ही उल्लेख किया गया है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

लैव्यव्यवस्था 27:23 समानांतर पद और संबंधित वचन

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लैव्यव्यवस्था 27:18 HINIRV संबंधित बाइबल पद का चित्र
लैव्यव्यवस्था 27:18 (HINIRV) »
और यदि वह अपना खेत जुबली के वर्ष के बाद पवित्र ठहराए, तो जितने वर्ष दूसरे जुबली के वर्ष के बाकी रहें उन्हीं के अनुसार याजक उसके लिये रुपये का हिसाब करे, तब जितना हिसाब में आए उतना याजक के ठहराने से कम हो।

लैव्यव्यवस्था 27:12 HINIRV संबंधित बाइबल पद का चित्र
लैव्यव्यवस्था 27:12 (HINIRV) »
तब याजक पशु के गुण-अवगुण दोनों विचार कर उसका मोल ठहराए; और जितना याजक ठहराए उसका मोल उतना ही ठहरे।

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