Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
लैव्यव्यवस्था 1 लैव्यव्यवस्था 2 लैव्यव्यवस्था 3 लैव्यव्यवस्था 4 लैव्यव्यवस्था 5 लैव्यव्यवस्था 6 लैव्यव्यवस्था 7 लैव्यव्यवस्था 8 लैव्यव्यवस्था 9 लैव्यव्यवस्था 10 लैव्यव्यवस्था 11 लैव्यव्यवस्था 12 लैव्यव्यवस्था 13 लैव्यव्यवस्था 14 लैव्यव्यवस्था 15 लैव्यव्यवस्था 16 लैव्यव्यवस्था 17 लैव्यव्यवस्था 18 लैव्यव्यवस्था 19 लैव्यव्यवस्था 20 लैव्यव्यवस्था 21 लैव्यव्यवस्था 22 लैव्यव्यवस्था 23 लैव्यव्यवस्था 24 लैव्यव्यवस्था 25 लैव्यव्यवस्था 26 लैव्यव्यवस्था 27Verse
लैव्यव्यवस्था 5:1 लैव्यव्यवस्था 5:2 लैव्यव्यवस्था 5:3 लैव्यव्यवस्था 5:4 लैव्यव्यवस्था 5:5 लैव्यव्यवस्था 5:6 लैव्यव्यवस्था 5:7 लैव्यव्यवस्था 5:8 लैव्यव्यवस्था 5:9 लैव्यव्यवस्था 5:10 लैव्यव्यवस्था 5:11 लैव्यव्यवस्था 5:12 लैव्यव्यवस्था 5:13 लैव्यव्यवस्था 5:14 लैव्यव्यवस्था 5:15 लैव्यव्यवस्था 5:16 लैव्यव्यवस्था 5:17 लैव्यव्यवस्था 5:18 लैव्यव्यवस्था 5:19



लैव्यव्यवस्था 5:4 का आरम्भिक संदर्भ और अर्थ
यह आयत उस समय की व्यवस्था को स्पष्ट करती है जब किसी शपथ के साथ की जाने वाली बातों की उत्तरदायित्वपूर्ण परख की जाती है। यदि कोई व्यक्ति किसी बुरे या भले काम को अंजाम देने के लिए सोचे-विचारे बिना शपथ खा ले, या किसी प्रकार की बात शपथ के साथ कह दे, तो उसका दोष तबाधिक स्पष्ट होता ہے जब उसे अपने किए का सच पता चल जाता है। इससे यह स्पष्ट होता है कि ईश्वर शपथ के साथ कहा गया हर वचन भी महत्व देता है और इंसान के विवेक पर निर्भर है कि वह शपथ का सम्मान करे या नहीं।
परमेश्वर और विश्वास का प्रकाश
इस वचन् में ईश्वर की पवित्रता और सत्यनिष्ठा का संकेत मिलता है—शपथ का सम्मान करना एक आचरणीय धर्मनिष्ठा है। यदि कोई शपथ तोड़ दे या बिना विचार किए कुछ कह दे, तो उसे अपने विचारों के परिणामों से निपटना होता है। यह हमें यह याद दिलाता है कि ईश्वर हर शब्द को देखता है और हमारे होंठों के द्वारा व्यक्त विचार भी कर्म बन जाते हैं।
शब्दों की भूमिका और चित्रण
यहां शपथ एक ऐसी रचना है जो सत्यता और जिम्मेदारी के बन्धन को दर्शाती है। “शपथ” लालच, भय, या गलती से भी सत्य से भटकने की स्थितियों में हमारे आचरण को परखती है। यदि सोचे-विचारे बिना कहा गया पाठ या वाक्य सामने आ जाए, तब उसका दोष उस क्षण बन गया है जब सच उजागर होता है।
अन्य सम्बंधित ग्रंथ
क्रॉस-रेफरेंसेस और उनके सार
1) नीति के बारे में स्पष्टता: किसी भी शपथ के वक्त विचारशीलता और सजगता आवश्यक है ताकि मिथ्या-गवाही न हो।
2) सत्य का मूल्य: सत्य को बनाए रखने के लिए विवेक और आत्म-नियंत्रण आवश्यक है।
3) जिम्मेदारी का व्यवहार: हमारे वचन हमारे कर्म के मार्गदर्शक होते हैं, इसलिए उन्हें प्रिय और सच्चे ढंग से बोना चाहिए।
आज के लिए व्यवहारिक अनुप्रयोग
1) हर शब्द पर विचार करें: शपथ या संकल्प के दौरान अपने उद्देश्य और परिणामों को सोचें; हाँ या न कहने से पहले सोचें कि क्या यह वास्तव में सत्य और ईमानदारी है।
2) नियंत्रण और दायित्व: किसी स्थिति में यदि आप जानते हैं कि आपके शब्द या शपथ गलत अर्थ दे सकते हैं, तो सावधान रहें या संपर्क करें ताकि निर्णय साफ़-साफ़ और सत्य पर आधारित हो।
3) दूसरों के लिए उदाहरण: अपने शब्दों के प्रति एक ऊँचा मानक रखें ताकि अन्य लोग भी ईमानदारी और सत्य के मार्ग पर चलें।
छोटा सार
यह शब्द-संरचना हमें सच्चे हृदय से बोलने, शपथ के महत्त्व को समझने और अपने वचनों के उत्तरदायित्व को स्वीकारने की प्रेरणा देती है। ईश्वर हर वचन को देखता है, इसलिए हमारे शब्दों में सच्चाई और विवेक का वजन बराबर रहे।
नोट: यह प्रस्तुति हिंदी के मानक हिनिर्व अनुवाद की दृष्टि से तैयार है। (Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के प्रकाशन-आधारित अंशों के संक्षिप्त विचार नीचे समाहित हैं जब उपयुक्त हों; पूर्ण उद्धरण आवश्यक होने पर मूल स्रोत देखें।)