Old Testament
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मलाकी 3:8 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
क्या मनुष्य परमेश्वर को धोखा दे सकता है? देखो, तुम मुझ को धोखा देते हो, और तो भी पूछते हो ‘हमने किस बात में तुझे लूटा है?’ दशमांश और उठाने की भेंटों में।
मलाकी 3:8 पद-दर-पद बाइबल टीका
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मलाकी 3:8 समानांतर पद और संबंधित वचन
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नीतिवचन 3:9 (HINIRV) »
अपनी सम्पत्ति के द्वारा और अपनी भूमि की सारी पहली उपज देकर यहोवा की प्रतिष्ठा करना;

मत्ती 22:21 (HINIRV) »
उन्होंने उससे कहा, “कैसर का।” तब उसने उनसे कहा, “जो कैसर का है, वह कैसर को; और जो परमेश्वर का है, वह परमेश्वर को दो।”

भजन संहिता 29:2 (HINIRV) »
यहोवा के नाम की महिमा करो; पवित्रता से शोभायमान होकर यहोवा को दण्डवत् करो।
मलाकी 3:8 पर हिन्दी टिप्पणी
सीधे अर्थ में यह verse पूछता है: क्या मनुष्य परमेश्वर को धोखा दे सकता है? परमेश्वर स्पष्ट कहता है कि असत्य और चोरी से उसने मुझ से धन लूटा गया है, खासकर दशमांश और उठाने की भेंटों के माध्यम से।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
मलाकी की किताब पुरानी व्यवस्था के अंत के समय की लिखित चेतावनी है, जहाँ नबी मलाकी यह दिखाते हैं कि याखोबियों के धार्मिक कर्मों में आंतरिक भ्रष्टाचार आ गया था। परमेश्वर ने मंदिर के सामने लोगों के आचरण का लेखा-जोखा माँगा: वे दशमांश और भेंटों के साथ परमेश्वर की आस्था से धोखेबाजी कर रहे थे। यहाँ भ्रष्टाचार सीधे भेंट-चढ़ाव के विकृत प्रयोग से प्रकट होता है, जो आदर्श प्रशासन और विश्वासी जीवन के धर्मशास्त्र के विरुद्ध है।
interpretive observations
संक्षिप्त थीमेटिक बिंदु
संबद्ध पारायणियाँ और संक्षिप्त व्याख्या
प्रकाशन 2:8 - यह दिखाता है कि परमेश्वर ने स्पष्ट कहा है कि धर्मपूर्वक दिया गया धन क्यों कड़ा दायित्व बनता है, यदि दिल में विश्वास नहीं।
मत्ती 23:23 - चर्चित उद्धरण में यीशु कहता है कि वे छोटे तत्वों के साथ बड़ा दामन भी निभाते हैं, परन्तु अन्यायपूर्ण हृदय से उठाये गये धर्म पर आलोचना नहीं रुकती; यहाँ दशमांश-भेंटों के प्रति सही आस्थाशीक्ति का महत्व समझ आता है।
रोम 12:1 - धर्मिक कर्म का उचित उद्देश्य: हमारे शरीर को परमेश्वर के योग्य बलीचढ़ावे के रूप में प्रस्तुत करना, न कि केवल औपचारिकता के तौर पर।
व्यावहारिक निष्कर्ष
धन-सम्पत्ति के साथ हमारा दृष्टिकोण एक परीक्षण है: हमारे दिल परमेश्वर के प्रति कितने समर्पित हैं? दशमांश और भेंटें केवल व्यवस्था नहीं, बल्कि हृदय की खरी-खरी अर्पणा की परीक्षा हैं। यदि çoहन से लाभ उठाने का मन बन जाए, तो भेंट भी निष्क्रिय या क्षीण हो जाती है। परन्तु यदि हम ईमानदारी, उदारता और विश्वास के साथ देते हैं, तो परमेश्वर की कृपा से आशीष मिलती है और समुदाय में विश्वास बढ़ता है।
मुख्य उद्धरण (सार): “क्या मनुष्य परमेश्वर को धोखा दे सकता है?” यह प्रश्न स्पष्ट करता है कि परमेश्वर हमारी हृदय-स्थिति देख लेते हैं; उससे भ्रष्ट आचरण उजागर होते हैं और धार्मिक कर्मों में सच्चाई की मांग होती है।
नोट: इस पाठ के भीतर Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सीधे उद्धरण यदि उपलब्ध हों, उन्हें नीचे एक-एक पंक्ति में चिन्हित किया गया है:
— “क्या मनुष्य परमेश्वर को धोखा दे सकता है?” (Adam Clarke के विचारों से निकटतम समालोचना में echo)