Old Testament
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प्रकाशितवाक्य 22:11 का सीधा अर्थ
जो जो भी नित्य कर्म के रूप में अन्याय करते हैं, वे वैसे ही रहते हैं; जो मलिन हैं, वे ऐसे ही बने रहते हैं; जो धर्मी हैं, वे वैसे ही रहते हैं; और जो पवित्र हैं, वे वैसे ही बने रहते हैं। इसका संदेश यह है कि अंत समय में प्रत्येक व्यक्ति अपने आचरण के अनुसार स्थिर बना रहता है—किसी भी बड़े परिवर्तन के बिना, स्वयं के दिल और जीवन के स्वाद के अनुसार स्थिति बनी रहती है।
पृष्ठभूमि और संरचना
प्रकाशितवाक्य के आख़िरी अध्याय में, विजयी ईश्वर के राज्य का विचार और मानव इतिहास के समापन की तस्वीर प्रस्तुत होती है। यहाँ यह पंक्ति निष्कलंक स्वतंत्रता, निर्णय और स्थिरता की बात करती है: लोगों की आत्म-स्थितियाँ उनके व्यवहार की अनुमानित परिणति बन जाती हैं। यह शुचिता और पवित्रता की सुनिश्चितता के विरुद्ध नहीं, बल्कि समय के साथ उनके परिणामों की स्थायित्वता की घोषणा है।
व्याख्यात्मक बिंदु
क्रिस्प cross-references
इन संदर्भों से निष्कर्ष निकलता है कि अंत के दिन हर किसी की आंतरिक प्रवृत्ति और बाह्य जीवन एकरूप प्रतिबिंबित होगा, और यह चक्र अपरिवर्तनीय नहीं, परन्तु निर्धारित परिणाम की और संकेत देता है।
पारिवारिक-यात्रा और अनुप्रयोग
संक्षिप्त निष्कर्ष
यह पद हमें याद कराता है कि अंत के समय हमारा जीवन-वृत्तांत हमारे आचरण के अनुसार परिष्कृत या पीड़ित हो सकता है। ईश्वर के सामने स्थिर रहना तब और भी महत्त्वपूर्ण है जब संसार से दूरी बनती है, क्योंकि कर्मों के परिणाम समय के साथ स्पष्ट हो जाते हैं।
महत्वपूर्ण उद्धरण (public-domain टिप्पणीकारों से संदर्भित सार)
Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सामान्य-उद्धरणों के अनुरूप, नीचे सुझाई गई सूक्ष्मधाराओं में उनके प्रसंगगत विवेचन समाहित हैं। यदि किसी उद्धरण की संक्षिप्त वाक्य जरूरत पड़ी तो केवल उनका संकेतित अर्थ प्रस्तुत किया गया है।
अनुमोदन-योग्य संकेत: Henry के मैथ्यू महलों की टिप्पणियों में कर्म-परिणाम का स्थायित्व विषय पर सामान्य विचार मिलता है; Barnes और Clarke में भी अंतिम दिन के निर्णय और आचरण के अनुरूप परिणाम का वर्णन मिलता है।