Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
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2 इतिहास 34:25 का तत्काल संदर्भ और संदेश
यह पद यह दर्शाता है कि ईश्वर ने राजा जोशिया के समय में इतिहास के उस चरण पर कड़े निर्णय लिए जब यहूदियों ने परमेश्वर के निर्देशों को त्यागकर देवी-देवताओं के लिये पूजा और धूप-जलाने का मार्ग अपनाया था। परमेश्वर ने विचार किया कि वे अपने ही धर्म के मूल पथ से भटककर परायी आस्थाओं की ओर गए, और उसी कारण उसे अपना क्रोध उठेगा और वह शांति बनाए नहीं रखेगा। यह संदेश यह स्पष्ट करता है कि अविश्वास और पाप का परिणाम न केवल व्यक्ति पर पड़ता है, बल्कि राष्ट्र की भौतिक और आध्यात्मिक स्थिति पर भी प्रभाव डालता है।
ईश्वर का स्वरूप और विश्वास के बारे में टेक्स्ट से सीख
कथन बतलाता है कि परमेश्वर न केवल बाहरी धर्म-क्रियाओं को देखता है, बल्कि दिल की नीति और प्रभु के विरुद्ध अपराध करने की प्रेरणा को भी मापता है। यह कहता है कि लोग एक बार नहीं, बल्कि बार-बार अपने देवताओं की चीजों के लिए धूप जलाते रहे, जिससे उसका प्रितकूल क्रोध भड़क उठा। फिर भी परमेश्वर अपनी शांति-लाभ की कृपा और न्याय के संतुलन के बीच विद्यमान रहता है; यह बताता है कि परमेश्वर अदालत के समय में भी दयालु और न्यायी रहते हैं।
महत्वपूर्ण शब्दों और चित्रों की स्पष्ट व्याख्या
क्रॉस-रेफरेंसे और उनसे संबंध
1) यह प्रवृत्ति पुराने नियम में बार-बार दिखती है: लोग ईश्वर की राह से भटककर दूसरे देवताओं की ओर जाते हैं—यह भक्ति-आचरण का प्रमुख परिहार है।
2) परमेश्वर के क्रोध के साथ-साथ उसकी उद्धारक निधि भी बनी रहती है; क्रोध के साथ न्याय और वचन-उद्धार का संयोजन स्थिर रहता है।
3) यह शिक्षा नीत पवित्र आचरण की पुनःस्थापना और प्रेरित-आस्था की पुनःस्थापना का आग्रह देती है; प्रेरक मानक के तौर पर नये करुणा और नये दृढ़ विश्वास की आवश्यकता पर बल देती है।
आज के लिए अनुप्रयोग
हम भी अपने समय में कई बार परमेश्वर की ओर सीधे देखे बिना, सांसारिक सुविधाओं, व्यक्ति-विशेषधर्मों या वैराग्यों के कारण आस्तियाँ बनाते हैं। इस वचन से याद रहे कि सत्य प्रेम और निष्ठा का मार्ग ही शांति देता है। यदि हम अपनी आस्थाओं में संतुलन बनाए रखें, ईश्वर के निर्देशों के अनुरूप जीवन जिएं, तो उसके क्रोध के बजाय उसकी कृपा और शांति हमारे साथ रहती है।
संयुक्त सार
2 इतिहास 34:25 बताता है कि पाप और त्याग के कारण परमेश्वर की जलजलाहट उठती है, परन्तु वह न्याय-निधान करते समय भी अपनी कृपा के द्वार खोलते रहते हैं। मोह-भ्रंति और अद्यतन आस्थाओं के बीच संतुलन बनाए रखना ही सच्चे विश्वास की निशानी है।
संदर्भीय टिप्पणीकारों से मिलते-जुलते विचार: हेन्री (Matthew Henry) और Barnes व Clarke के सार्वजनिक-डायरी चर्चित विचार इस प्रकार की भर्त्सना-निष्कर्ष के साथ मिलते हैं—जहाँ परमेश्वर के क्रोध का कारण पाप है, वहीं उसकी दया भी उपलब्ध है जब दिल से लौटकर उसी की ओर लौटें।