Old Testament
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2 कुरिन्थियों 11:1 2 कुरिन्थियों 11:2 2 कुरिन्थियों 11:3 2 कुरिन्थियों 11:4 2 कुरिन्थियों 11:5 2 कुरिन्थियों 11:6 2 कुरिन्थियों 11:7 2 कुरिन्थियों 11:8 2 कुरिन्थियों 11:9 2 कुरिन्थियों 11:10 2 कुरिन्थियों 11:11 2 कुरिन्थियों 11:12 2 कुरिन्थियों 11:13 2 कुरिन्थियों 11:14 2 कुरिन्थियों 11:15 2 कुरिन्थियों 11:16 2 कुरिन्थियों 11:17 2 कुरिन्थियों 11:18 2 कुरिन्थियों 11:19 2 कुरिन्थियों 11:20 2 कुरिन्थियों 11:21 2 कुरिन्थियों 11:22 2 कुरिन्थियों 11:23 2 कुरिन्थियों 11:24 2 कुरिन्थियों 11:25 2 कुरिन्थियों 11:26 2 कुरिन्थियों 11:27 2 कुरिन्थियों 11:28 2 कुरिन्थियों 11:29 2 कुरिन्थियों 11:30 2 कुरिन्थियों 11:31 2 कुरिन्थियों 11:32 2 कुरिन्थियों 11:33



2 कुरिन्थियों 11:29 — संदर्भ और सार
पौलुस इस पद में अपने आत्म-समर्पण, दायित्व और दुर्दशाओं के बीच अपनी निष्ठा को स्थापित करता है। यह वचन उसे प्रेरित करता है कि वह अपनी निर्बलताओं और पाप-लग्नताओं के बावजूद विश्वास में अडिग रहे, क्योंकि वह प्रभु की कृपा और उसकी आत्मिक जिम्मेदारी के प्रति जवाबदेह है।
पद का तात्पर्य और पवित्रता की राह
“किस की निर्बलता से मैं निर्बल नहीं होता? किस के पाप में गिरने से मेरा जी नहीं दुःखता?” — यहाँ पौलुस अपने दायित्व के बोध के साथ स्वयं को एक सामान्य प्राणी की तरह देखता है, किन्तु वह यह भी स्पष्ट करता है कि उसका आकर्षण, उसके भीतर की कमजोरियाँ और परख के क्षण उसे निर्बल नहीं बना देते हैं। बल्कि उसका उद्देश्य यह है कि वह परमेश्वर की महिमा के लिये समय-समय पर समर्पित रहे और स्थानीय चर्च के लिए प्रेरणास्वरूप बना रहे। यह संदेश आज भी यह कहता है कि सांसारिक कठिनाइयों के बीच ईश्वर का उद्देश्य और सतर्कता हमारे विश्वास को दृढ़ बनाते हैं।
ईश्वर की कृपा, विश्वास और मुक्त किया जाना
फलस्वरूप, यह वचन ईश्वर के अनुग्रह की महत्ता पर जोर देता है। जब व्यक्ति अपनी निर्बलताओं के कारण दयालुता और आशीर्वाद के लिए कहता है, तब ईश्वर की कृपान्नुमा सहायता तुरंत मिलती है। पौलुस स्पष्ट रूप से दिखाता है कि परमेश्वर की शक्ति हमारी कमज़ोरियों में सिद्ध होती है, ताकि लोग कहें कि यह सब उस प्रभु की कृपा है जो हमारे भीतर काम करता है।
शब्द-चित्र और महत्वपूर्ण शब्दों की स्पष्टता
- निर्बलता: यह शब्द शारीरिक, मानसिक या आध्यात्मिक असमर्थता को दर्शाता है; परन्तु इसे कमजोरी के साथ पाप से भी जोड़कर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि परख और परीक्षा के समय ईश्वर पर निर्भर रहने की आवश्यकता बताता है।
- दुःख: यहाँ दुःख उसी आघात या गिरावट का संकेत है जो दूसरों के कारण या अपनी नज़रों के कारण उत्पन्न होता है; इसका मूल उद्देश्य परमेश्वर की नज़दीकी को और गहरा करना है।
संबंधित पाठ
- प्रेरितों के कार्य 5:41 में यह चर्चा मिलती है कि शत्रुओं के अत्याचारों के बीच भी प्रेरितों ने परमेश्वर की कृपा पर विश्वास बनाए रखा।
- 2 कुरिन्थियों 12:9-10 — परमेश्वर कहे, ”मेरीGrace तुम्हारे साथ है; इसलिए शक्ति कमजोरों में अधिक दृढ़ होती है।”
- गलतियों के क्षमा के बारे में हिब्रियों 4:15-16 भी नमूना देता है कि हम एकउच्च और सुस्पष्ट पवित्र बृहत साथ में पहुँच सकते हैं।
आज के लिए उपयोगी प्रायोगिक अनुभाग
कुल सार
जो चीज़ इस वचन से निकलती है वह यह कि ईश्वर की शक्ति हमारी कमजोरी में प्रकाशित होती है। यदि हम अपनी निष्ठा और विश्वास को बनाए रखें, तो नहीं—बल्कि कहा जाए कि हमारे लिए सबसे बड़ी प्रशंसा वह है जब परमेश्वर अपने कार्य को हमारे भीतर करके उसे सम्पূর্ণ करता है।
को-रीफरेंस टिप्पणी (संक्षेप)
यह पाठ Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke की सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणियों के संदर्भ में यह दर्शाता है कि परमेश्वर की कृपा और शक्ति हमारी कमजोरी के बीच अधिक स्पष्ट होती है, और ईश्वर की महिमा के लिए हमारा जीवन समर्पित रहे। संभावित उद्धरण: “मेरी Grace तुम्हारे साथ है; इसलिए शक्ति दुर्बलताओं में अधिक दृढ़ होती है” — यदि उद्धृत हों तो संक्षेप में ही उपयोग करें।