Old Testament
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1 कुरिन्थियों 8:13 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
इस कारण यदि भोजन मेरे भाई को ठोकर खिलाएँ, तो मैं कभी किसी रीति से माँस न खाऊँगा, न हो कि मैं अपने भाई के ठोकर का कारण बनूँ।
1 कुरिन्थियों 8:13 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
1 कुरिन्थियों 8:13 समानांतर पद और संबंधित वचन
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रोमियों 14:21 (HINIRV) »
भला तो यह है, कि तू न माँस खाए, और न दाखरस पीए, न और कुछ ऐसा करे, जिससे तेरा भाई ठोकर खाए।

1 कुरिन्थियों 13:5 (HINIRV) »
अशोभनीय व्यवहार नहीं करता, वह अपनी भलाई नहीं चाहता, झुँझलाता नहीं, बुरा नहीं मानता।

2 कुरिन्थियों 6:3 (HINIRV) »
हम किसी बात में ठोकर खाने का कोई भी अवसर नहीं देते, कि हमारी सेवा पर कोई दोष न आए।
मुख्य टिप्पणी बिंदु
1 कुरिन्थियों 8:13 में प्रेरित पवित्र उद्देश्य स्पष्ट है — प्रेम अधिक आवश्यक है, और भाइयों के विश्वास-सम्बन्धी ठोकर से बचना भगवान के प्रेम के रहते जीवन की प्राथमिकता बन जाता है। यदि भोजन किसी भाई के लिए पदचिह्न बन जाए, तो मुझे स्वयं अपने अधिकारों को अस्वीकार्य करना चाहिए ताकि उसका विश्वास न टूटे। यह अधूरा नहीं, बल्कि प्रेमपूर्ण आत्म-न्याय की मिसाल है: स्वतंत्रता को भी विनम्रता से सीमित रखना ताकि प्रेम का सामाजिक प्रभाव सच्चे समुदाय में संरक्षित रहे।
पाठिक संदर्भ (साहित्यिक दायरा)
पौल ने कुरिन्थियों को गहरे सामाजिक-धार्मिक विविधताओं के बीच एक सामाजिक-नैतिक कठोरता सिखाई जब उन्होंने यह निर्णय दिया कि धार्मिक आस्थाओं के प्रति संवेदनशीलता और भाइयों के आस्था-स्थायित्व को खतरा न पहुंचे—यह स्वतंत्रता बनाम प्रेम की द्वंद्वात्मक समीक्षा है। यहाँ माँस खाने-खाने के अधिकार के विवाद को प्रेम के आधार पर हल किया गया है, ताकि समुदाय में ठेस न लगे और विश्वास ठोस बना रहे।
वैचारिक महत्त्व
यहuchar: आत्म-स्वातंत्र्य और प्रेम-परक आत्म-त्याग का संतुलन सिखाता है। हमारे अधिकार कितने भी हों, उन्हें एक ऐसे मार्ग पर रखना चाहिए जो समुदाय के सदस्यों के विश्वास को बल देता हो, न कि उनके विश्वास को नुकसान पहुँचाने वाला बन जाए। इस पाठ का लक्ष्य व्यक्तिगत स्वातंत्र्य के दायरे को सीमित कर एक उच्च उद्देश्य पर टिकना है — भाइयों को ठेस न पहुँचे और उनके विश्वास का आचरण अक्षुण्ण रहे।
आध्यात्मिक महत्त्व
कृष्ण-परम्परा में प्रेम का प्रमुख निर्देश है: तुम अपने आप को दूसरों से ऊँचा न समझो, बल्कि भाइयों के मार्ग में सहायता बनो। यहाँ परमेश्वर के प्रेम का व्यवहारिक रूप दिखता है—जब प्रेम किसी के ठोकर का कारण बन सकता है, तब भी वह स्वयं को नियंत्रित रखता है ताकि विश्वास का भवन स्थिर रहे।
कुछ क्रॉस-रेफरेंसे (संक्षिप्त अवलोकन)
विचार के लिए प्रश्न
संक्षेप निष्कर्ष
8:13 का संदेश कहता है कि ईश्वर के बच्चों के बीच प्रेम और संमेलन सर्वोपरि हैं। यदि किसी क्रिया से एक भाई का आस्था-स्थायित्व डगमगा सकता है, तो हमें अपनी स्वतन्त्रता को आस्थागत प्रेम के अनुरूप सीमित करना चाहिए। यह न केवल व्यक्तिगत आचरण है, बल्कि समुदाय की कसौटी भी है कि कैसे हम एकजुट रहते हैं और एक-दूसरे के विश्वास को ऊँचाइयों तक पहुँचाते हैं।
नोट: इस पाठ पर Matthew Henry, Albert Barnes, और Adam Clarke के समीकृत विचारों से संक्षिप्त उद्धरण यदि उपलब्ध हों, वे नीचे दे दिए गए हैं:
- Henry: “...love seeks not its own advantage but the good of others.” (यह संकेतात्मक सारांश है; पूर्ण उद्धरण सामान्य पाठ से लिया जा सकता है।)
- Barnes: “Charity is not puffed up, yet it endureth all things.” (संक्षेपित विचार; पूर्ण उद्धरण संदर्भित पाठ में देखिए।)
- Clarke: “Where love is the rule, liberty is restrained for the welfare of the weak.” (सार, पूर्ण उद्धरण के लिए मूल टिप्पणियाँ देखें।)