1 कुरिन्थियों 8:7 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

परन्तु सब को यह ज्ञान नहीं; परन्तु कितने तो अब तक मूरत को कुछ समझने के कारण मूरतों के सामने बलि की हुई को कुछ वस्तु समझकर खाते हैं, और उनका विवेक निर्बल होकर अशुद्ध होता है।

1 कुरिन्थियों 8:7 पद-दर-पद बाइबल टीका

1 कुरिन्थियों 8:7 पर एक स्पष्ट मार्गदर्शन

कुल मिलाकर यह पाठ बताता है कि ईमानदार विश्वासियों के बीच भी वह ज्ञान और विवेक होना चाहिए जो निर्थक तर्कों को काट सके और विवेक को उपदेशित करे। पवित्र लेख में मूरत-पूजा के विरुद्ध चेतावनी के साथ, प्रेरित पॉल कहते हैं कि हर किसी को इस ज्ञान की परख समान रूप से नहीं है; कुछ अब भी मूरतों को वास्तविक वस्तु मानकर खाते हैं। इसका मतलब यह है कि उनका विवेक अभी पूर्ण बल पर नहीं है, और उनकी आचरणतः अशुद्धि को रास्ता बना देती है।

पाठ का विन्यास और संदर्भ

यह अध्याय कॉरण्थुस समुदाय के भीतर विभिन्न विश्वासों के लिए नीति बनाता है—खासकर भोजन से जुड़ी सामाजिक और धार्मिक प्रथाओं के संदर्भ में। 8:7 बताता है कि ज्ञान से भी विवेक आवश्यक है, ताकि विश्वास मजबूत रहे और निर्बल भाइयों के लिए मार्गदर्शक बना रहे।

मुख्य आध्यात्मिक पाठ

  1. ज्ञान के साथ विवेक आवश्यक है: वास्तविक ज्ञान सकारात्मक परिवर्तन लाता है, पर उसका प्रयोग करुणा और प्रेम से किया जाना चाहिए ताकि दूसरों पर बोझ न पड़े।
  2. स्वतंत्रता के बीच भी जिम्मेदारी: जिस वस्तु के लिए आप स्वतंत्र हैं, उसका प्रयोग दूसरों के विश्वास को चोट न दे—यह परमेश्वर की इच्छा के अनुकूल है।
  3. आत्मिक विवेक का उन्नयन: निर्बल भाइयों के हित में अपनी स्वतंत्रता को कभी-कभी त्यागना भी एक पूर्ण प्रेम का अभिषेक है।

अन्य बाइबल पाठ से संगति

- रोम 14 और यहूदियों 10-12 जैसे पाठों के साथ: आत्मिक स्वतंत्रता और दूसरों के विश्वास की रक्षा के बीच संतुलन पर जोर। इन पाठों में भी यह विचार उभरता है कि आचरण में प्रेम सर्वोच्च है, ताकि बहुसंख्यक विश्वास विश्वास योग्य बने।

- योहान 13:35 और मत्ती 5:16: प्रेम और आकर्षक उदाहरण से दुनिया को ईश्वर के प्रेम का संदेश देना—स्वतंत्रता के साथ भी ईमानदारी और नम्रता का प्रदर्शन।

व्यावहारिक अनुप्रयोग

  • यदि आप किसी ऐसी चीज पर स्वतंत्र हैं जिसे कुछ विश्वास नहीं कर पाते, तो दूरी बनाए रखें ताकि उनके विश्वास को ठेस न लगे।
  • अपने विवेक को सतर्क रखें: यदि किसी ने आपको बतौर गुरु-बल दिए जाने की अपेक्षा की, तो उसे प्रेम और सम्मान के साथ संतुलित करें।
  • समुदाय के भीतर कमजोर भाइयों के लिए मिसाल बनें—आपकी पहल उनकी आस्था को उन्नत कर सकती है, न कि कठोरता बढ़ाने वाली बनी रहे।

संक्षेप

8:7 हमें बताता है कि ज्ञान अकेला पर्याप्त नहीं है; विवेक और प्रेम के साथ परिशीलित यह ज्ञान सबसे बड़ी समाज-निर्माण ताकत है। जब हम अपनी स्वतंत्रताओं को नियंत्रण में रखते हैं और कमजोर भाइयों के हित में विचार करते हैं, तब परमेश्वर की सामुदायिक सजीवता बढ़ती है।

संकेतित या उद्धृत टिप्पणियाँ (Public-domain commentators)

नोट: इस प्रविष्टि में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke से संक्षित उद्धरण केवल आवश्यकतानुसार बताए गए हैं, ताकि मूल विचार स्पष्ट रहें।

यहां वे प्रमुख विचार हैं जिन्हें पार्श्व-व्याख्या में लिया गया है:

- “Knowledge puffeth up, but charity edifieth” का सार यह है कि ज्ञान से अभिमान बढ़ सकता है जब प्रेम नहीं रहता; विवेक प्रेम के साथ ही प्रकट होता है।

Cross-references

रोम 14:1-23: विश्वास के विविध स्तरों पर एक-दूसरे के बालिदान-मान को सम्मान देने और नहीं तो गलत-आचरण से बचने का निर्देश।

मत्ती 5:13-16: विश्व के सामने ईश्वर के प्रेम और नम्रता का उदाहरण बनना—स्वतंत्रता के साथ सत्कार।

याकूब 1:19-20: तेज-गति से बोलना और क्रोध से दूर रहना—विवेकपूर्ण आत्म-नियमन का महत्व।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

1 कुरिन्थियों 8:7 समानांतर पद और संबंधित वचन

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मैं जानता हूँ, और प्रभु यीशु से मुझे निश्चय हुआ है, कि कोई वस्तु अपने आप से अशुद्ध नहीं, परन्तु जो उसको अशुद्ध समझता है, उसके लिये अशुद्ध है।

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तेरा जो विश्वास हो, उसे परमेश्‍वर के सामने अपने ही मन में रख*। धन्य है वह, जो उस बात में, जिसे वह ठीक समझता है, अपने आप को दोषी नहीं ठहराता।

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परन्तु चौकस रहो, ऐसा न हो, कि तुम्हारी यह स्वतंत्रता कहीं निर्बलों के लिये ठोकर का कारण हो जाए।

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