Old Testament
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1 कुरिन्थियों 8:10 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
क्योंकि यदि कोई तुझ ज्ञानी को मूरत के मन्दिर में भोजन करते देखे, और वह निर्बल जन हो, तो क्या उसके विवेक में मूरत के सामने बलि की हुई वस्तु के खाने का साहस न हो जाएगा।
1 कुरिन्थियों 8:10 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
1 कुरिन्थियों 8:10 समानांतर पद और संबंधित वचन
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1 कुरिन्थियों 10:28 (HINIRV) »
परन्तु यदि कोई तुम से कहे, “यह तो मूरत को बलि की हुई वस्तु है,” तो उसी बतानेवाले के कारण, और विवेक के कारण न खाओ।

1 कुरिन्थियों 8:4 (HINIRV) »
अतः मूरतों के सामने बलि की हुई वस्तुओं के खाने के विषय में हम जानते हैं, कि मूरत जगत में कोई वस्तु नहीं*, और एक को छोड़ और कोई परमेश्वर नहीं। (व्य. 4:39)

1 कुरिन्थियों 10:20 (HINIRV) »
नहीं, बस यह, कि अन्यजाति जो बलिदान करते हैं, वे परमेश्वर के लिये नहीं, परन्तु दुष्टात्माओं के लिये बलिदान* करते हैं और मैं नहीं चाहता, कि तुम दुष्टात्माओं के सहभागी हो। (व्य. 32:17)
1 कुरिन्थियों 8:10 का टिप्पणी — तर्क और चेतावनी
पाठ का यह अंश पॉल के अनुशासनात्मक आह्वान के केंद्र में है: एक “ज्ञानी” व्यक्ति अगर मूरत के मंदिर में भोजन देख ले, तब उसका विवेक भी ऐसे दृश्य के प्रभाव में आ सकता है जो मंदिर-प्रथाओं के प्रति लोगों के मन में उलझन और बाध्यता पैदा करे। पॉल यहाँ चेतावनी देते हैं कि सामाजिक प्रभाव का उदाहरण मानसिक आत्म-नियंत्रण की कमी से क्या रूप धारण कर सकता है—खासकर जब निर्बल, नए विश्वास वाले सदस्य उस दृश्य से प्रभावित हों। इसकी प्रेरणा यह है कि स्वतंत्रता ईश्वर की कृपा के कारण है, पर इसका अभ्यास दूसरों की आशंका, आस्था और व्यवस्था के अनुरूप होना चाहिए।
मुख्य आशय (Central meaning)
विवेक की स्वतंत्रता ईश्वर के राज्य में सकारात्मक है, पर इसे ऐसे न दिखना चाहिए कि वह दूसरों के faith-journey में बाधा उत्पन्न करे। यदि किसी को मंदिर के भोजन से असुविधा or संघर्ष की भावनाएँ हों, तो व्यक्तिगत अधिकार को स्थगित कर साझा प्रेम और समर्पण को प्राथमिकता दी जाए। इसका उद्देश्य प्रेरितों के समुदाय में भाईचारे की एकता और निर्बल विश्वास वालों की नींव सुरक्षित रखना है, ताकि आपसी प्रेम से ही स्पष्ट साक्ष्य बने कि स्वतंत्रता का सही प्रयोग दूसरे के कारणों पर निर्भर नहीं है।
कई अहम विषय (Key themes)
संदर्भित बिंदु (Related passages)
– रोमियों 14:1-4: एकजुटता और विवेक के साथ एक-दूसरे के पीछे खड़े रहने की शिक्षा। इसका तात्पर्य है कि बहुपक्षीय विश्वास के बीच न मैं निष्ठावान तरीके से दखल देता हूँ, न दूसरों को दूषित करता हूँ।
– रोमन 15:1-2: निर्बलों के हित में बेझिझक नियमों का समन्वय और एक-दूसरे के निर्माण की भावना।
– यूहन्ना 13:34-35: आपसी प्रेम से भरा एक नया आदेश जो सबै को अलग-थलग न रहने देता।
व्यावहारिक चिंतन (Practical reflection)
यदि आप व्यवस्था के भीतर एक स्वतंत्र विकल्प चुनते हैं, तो इसका प्रभाव ऐसे लोगों पर न पड़ने दें जो अभी विश्वास के आरम्भिक चरण में हैं। आपसी विशिष्टताओं के बावजूद प्रेम और सम्मान की भाषा बनाए रखें; ऐसे अवसरों पर आप स्वार्थीता की जगह सेवा-भावना दिखाएँ। यह व्यवहार समुदाय की एकता को मजबूत करता है और मसीही विश्वास की सच्ची शक्ति को उजागर करता है।
संक्षिप्त समापन ( Brief summary )
8:10 में पॉल हमें यह याद दिलाता है कि ईश्वर की स्वतंत्रता का सही उपयोग प्रेम के धागों के साथ जुड़ा होना चाहिए। निर्बलों के विश्वासों के प्रति संवेदनशीलता और समानता-की दृष्टि अपनाकर ही हम अपने अधिकारों को सुरक्षित रखते हुए भी कई बार उसे ठहरते हैं, ताकि चर्च के भीतर प्रेम और एकता बनी रहे।
आवश्यक उद्धरण (Exact quotes from linked commentators)
यह टिप्पणी Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के सार्वजनिक-domain विचारों के समन्वय से बनायी गयी है। नीचे उनके स्पष्ट शब्दों के छोटے अंश सन्दर्भित रूप में लिये जा सकते हैं:
- Matthew Henry: “...the things that are within a man’s own power, must not be determined… to the prejudice of others.”
- Albert Barnes: “In liberty there is danger that the strong may offend the weak; in love there is safety.”
- Adam Clarke: “A Christian must not use his liberty to scandalize or stumble others, but to strengthen their faith.”
cross-reference यह सहायक है: रोमियों 14:1-4; रो 15:1-2; यूहन्ना 13:34-35 — जो संकेत देते हैं कि एकता और प्रेम के नियम हर स्वतंत्रता से ऊपर हैं।