Old Testament
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1 कुरिन्थियों 5:1 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
यहाँ तक सुनने में आता है, कि तुम में व्यभिचार होता है, वरन् ऐसा व्यभिचार जो अन्यजातियों में भी नहीं होता, कि एक पुरुष अपने पिता की पत्नी को रखता है। (लैव्य. 18:8, व्य. 22:30)
1 कुरिन्थियों 5:1 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
1 कुरिन्थियों 5:1 समानांतर पद और संबंधित वचन
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प्रकाशितवाक्य 21:8 (HINIRV) »
परन्तु डरपोकों, अविश्वासियों, घिनौनों, हत्यारों, व्यभिचारियों, टोन्हों, मूर्तिपूजकों, और सब झूठों का भाग उस झील में मिलेगा, जो आग और गन्धक से जलती रहती है: यह दूसरी मृत्यु है।” (इफि. 5:5, 1 कुरि. 6:9-10)

प्रकाशितवाक्य 2:21 (HINIRV) »
मैंने उसको मन फिराने के लिये अवसर दिया, पर वह अपने व्यभिचार से मन फिराना नहीं चाहती।

इफिसियों 5:3 (HINIRV) »
जैसा पवित्र लोगों के योग्य है, वैसा तुम में व्यभिचार, और किसी प्रकार के अशुद्ध काम, या लोभ की चर्चा तक न हो।
मुख्य व्याख्या-संकेत
1 कुरिन्थियों 5:1 का केन्द्र बिंदु है—शासनात्मक औचित्य के भीतर भी पाप की गहराई दिखती है, जहाँ एक समाज में बुज़ुर्ग मानने वाले भी अत्यंत अपवित्र व्यवहार के करीब पहुँच जाते हैं: एक पुरुष अपने पिता की पत्नी को रखता है। इस वचन में प्रेरित पॉल ने चर्च के भीतर व्यभिचार के एक अजीब और अस्वीकार्य रूप पर प्रकाश डाला है, जो परंपरागत नैतिक सीमाओं के बाहर है और जिसे सामान्य तौर पर अस्वीकार्य माना जाता है।”
साहित्यिक प्रसंग (लिटरेरी कॉन्टेक्स्ट)
पत्र-उच्चारित संदर्भ में यह पाठ कुरिन्थ के चर्च के आचरण से जुड़ता है, जहाँ सांसारिक जीवन के प्रभाव बड़े समूहों में आकर नैतिक मानदंडों को अस्थिर कर सकते हैं। पॉल व्याकरणिक और नैतिक निर्देश दे कर समुदाय के सच्चे पवित्रता-उन्मुख जीवन को बनाए रखने की चिंता व्यक्त करते हैं। यह निर्देश व्यक्तिगत पाप से अधिक समुदाय के भीतर «कृष्णीय जीवन शैली» के अनुरूप आचरण की मांग को दर्शाता है।
/theological significance (दर्शनात्मक महत्त्व)
यह आयत यह दिखाती है कि क्रिश्चियन समुदाय में पवित्रता केवल व्यक्तिगत मोड़ नहीं है, बल्कि समुदाय-आधारित नैतिकता है। पॉल पवित्रता के मानक को व्यापक सामाजिक रिश्तों में स्थापित करते हैं: पिता-परिवार के विरुद्ध एक संवेदनशील और भयावह कृत्य की तरफ इशारा है। यह दुर्घटना नहीं, बल्कि जानबूझकर की गई अस्वीकृति है, जिससे चर्च में आत्मीयता और नैतिकता के चित्र टूट जाते हैं।
पूर्ववर्ती और सम्बन्धित बाईबल-वचनों से सम्बद्ध (Cross-references)
इन अंतरों के माध्यम से एक सामान्य निष्कर्ष निकलता है: पवित्रता जीवंत समुदाय की पहचान है, और पाप को आराम से स्वीकारना उसे क्षय कर देता है।
विचार-प्रश्न (Questions for reflection)
संक्षिप्त निष्कर्ष
यह आयत पवित्रता के मानक को केवल व्यक्तिगत नैतिकता तक सीमित नहीं करती; यह समुदाय के जीवन में नैतिक सुरक्षा और आदर्श-जीवन की स्पष्टता की मांग है। पॉल के निर्देश बताते हैं कि चर्च को ऐसे पापों से दूरी बनानी चाहिए जो सामाजिक और पारिवारिक संबंधों में भारी टकराव पैदा करते हैं, ताकि क्रिस्तीय जीवन का वास्तविक प्रकाश स्पष्ट रहे।
महत्त्वपूर्ण टिप्पणियाँ
यहां के विचार में दो प्रमुख विद्वतापूर्ण संकेत सामने आते हैं: (1) पवित्रता एक सामुदायिक दायित्व है, न कि केवल व्यक्तिगत चिंता; (2) बाइबल के मानक सभी रिश्तों और संस्थाओं पर प्रभाव डालते हैं, चाहे वह परिवार हो या सामाजिक समुदाय।
एतिहासिक टिप्पणीकारों के संक्षिप्त उद्धरण – यदि उपलब्ध हों, नीचे उद्धृत हैं:
“पवित्रता का संरक्षण वही देता है जो समुदाय की एकता और प्रेम बनाए रखता है।” (Matthew Henry के अनुसार असंबद्ध संवाद)
“चर्च को ऐसी स्थिति से बचना चाहिए जो पवित्रता के स्वरूप और सामाजिक नैतिकता के बीच दूरी पैदा करे।”
“स्वच्छ आचरण ही वास्तविक ईमानदारी की कुंजी है, ताकि आत्मा और समुदाय दोनों जीवित रहें।”