Old Testament
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1 कुरिन्थियों 5:12 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
क्योंकि मुझे बाहरवालों का न्याय करने से क्या काम*? क्या तुम भीतरवालों का न्याय नहीं करते?
1 कुरिन्थियों 5:12 पद-दर-पद बाइबल टीका
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1 कुरिन्थियों 5:12 समानांतर पद और संबंधित वचन
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मरकुस 4:11 (HINIRV) »
उसने उनसे कहा, “तुम को तो परमेश्वर के राज्य के भेद की समझ दी गई है, परन्तु बाहरवालों के लिये सब बातें दृष्टान्तों में होती हैं।

1 कुरिन्थियों 5:3 (HINIRV) »
मैं तो शरीर के भाव से दूर था, परन्तु आत्मा के भाव से तुम्हारे साथ होकर, मानो उपस्थिति की दशा में ऐसे काम करनेवाले के विषय में न्याय कर चुका हूँ।

लूका 12:14 (HINIRV) »
उसने उससे कहा, “हे मनुष्य, किस ने मुझे तुम्हारा न्यायी या बाँटनेवाला नियुक्त किया है?” (निर्ग. 2:14)
मुख्य निहितार्थ: अंदरूनी चितर और बहिरानी जाँच का संतुलन
1 कुरिन्थियों 5:12 में प्रेरित पॉल स्पष्ट करते हैं कि उत्पन्न संघर्षों में हम बाहरी निंदक या बाहर वालों की जाँच से पहले अपने भीतर के मन-भावों को देखना चाहिए। यह वाक्य, "जो बाहर वालों का न्याय करने से क्या काम? क्या तुम भीतरवालों का न्याय नहीं करते?" समुदाय में फूट-फूटाव के बीच नैतिक विवेक के सही अनुपात पर जोर देता है। इसे ση जीवन के संदर्भ में समझना चाहिए: हर आत्मा को अपना आचरण और पवित्रता के प्रति जवाबदेही दिखानी चाहिए, पर यह जिम्मेदारी बाहरी मान्यता-प्रसार से नहीं, बल्कि आंतरिक परिवर्तन और प्रेमपूर्ण अनुशासन से आनी चाहिए।
साहित्यिक संदर्भ के साथ पृष्ठभूमि
पॉल ने कुरिन्थ समुदाय में रहस्य-समूह, आचार-धारणा और नैतिक द्वंद्वों को देखते हुए यह वक्तव्य किया। अध्याय 5 में लेखक चर्च में व्यभिचार के प्रकट होने पर व्यवस्थित कदम उठाने की बात करते हैं; पर यह वाक्य उसके बाहर के लोगों के आकलन पर नहीं, बल्कि अपने भीतर की पवित्रता पर केंद्रित है। यह भी बताता है कि मसीही समुदाय को पारस्परिक पवित्रता के लिए जवाबदेह होना चाहिए, न कि केवल पंक्ति-बंद निंदा से संचालित होना चाहिए।
थियोलॉजिकल significance
गलत व्यवहार के बारे में निर्णय व्यक्ति-समाज के भीतर होना चाहिए; परमेश्वर के सामने असली न्याय वही है जो मानव जाति के अंदर की प्रेरणा, दिल की स्थिति और प्रेम के साथ संगत हो। बाहरी नियंत्रण से अधिक महत्वपूर्ण है आंतरिक परिवर्तन, जो एक स्वस्थ समुदाय बनाता है। विशुद्ध प्रेम के साथ विवाद और अनुशासन एक साथ चलते हैं ताकि गलती न पुनरावृत्ति हो और समाज में सत्य का उजाला बना रहे।
कथा-आनुरूप cross-references
इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि क्रिश्चियन नैतिकता में ‘न्याय करना’ की सही सीमा क्या है: अंदर की बात की सच्चाई और प्रेमपूर्ण समर्थन के साथ कोई भी अनुशासन।
प्योरिटी: विचारणीय प्रश्न
निष्कर्ष
यह वाक्य शिक्ष देता है कि चर्च में अनुशासन और न्याय तभी पूर्ण होते हैं जब भीतर की पवित्रता और प्रेम-चर्या भी समुचित रूप से जुड़ती है। बाहरी जाँच से पहले अपने दिल की समीक्षा करें; परमेश्वर के न्याय का मर्म यही कहता है कि पहले अपने भीतर के अंधेरे से निपटें, फिर दूसरों की चूकों पर विचार करें। इसका उद्देश्य चरित्र-निर्माण और समुदाय की एकता है, न कि क्रोध या अपमान।