Old Testament
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1 कुरिन्थियों 5:11 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
मेरा कहना यह है; कि यदि कोई भाई कहलाकर, व्यभिचारी, या लोभी, या मूर्तिपूजक, या गाली देनेवाला, या पियक्कड़, या अंधेर करनेवाला हो, तो उसकी संगति मत करना; वरन् ऐसे मनुष्य के साथ खाना भी न खाना।
1 कुरिन्थियों 5:11 पद-दर-पद बाइबल टीका
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1 कुरिन्थियों 5:11 समानांतर पद और संबंधित वचन
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2 थिस्सलुनीकियों 3:6 (HINIRV) »
हे भाइयों, हम तुम्हें अपने प्रभु यीशु मसीह के नाम से आज्ञा देते हैं; कि हर एक ऐसे भाई से अलग रहो, जो आलस्य में रहता है, और जो शिक्षा तुमने हम से पाई उसके अनुसार नहीं करता।

रोमियों 16:17 (HINIRV) »
अब हे भाइयों, मैं तुम से विनती करता हूँ, कि जो लोग उस शिक्षा के विपरीत जो तुम ने पाई है, फूट डालने, और ठोकर खिलाने का कारण होते हैं, उनसे सावधान रहो; और उनसे दूर रहो।

2 थिस्सलुनीकियों 3:14 (HINIRV) »
यदि कोई हमारी इस पत्री की बात को न माने, तो उस पर दृष्टि रखो; और उसकी संगति न करो, जिससे वह लज्जित हो;
पद के आस-पास का संदर्भ
1 कुरिन्थियों 5:11 वह अध्याय जो पाप और चर्च की पवित्रता के बीच संतुलन बनाता है, मर्कजीसेर की घटना से जुड़ा है—गलातियों-समूह के बीच व्यभिचार, लोभ, मूर्तिपूजा आदि कार्यों के बारे में स्पष्ट निर्देश देता है। इस संदर्भ में प्रेरित पौलुस शहर कुरिन्थ के नगरिक जीवन की mno-चाल-चलन की रीति से निपटते हैं और सदस्यत्व के नैतिक मानदंड प्रस्तुत करते हैं।
ईश्वरीय दृष्टि पर पाठ की गूंज
इस पद से स्पष्ट होता है कि ईश्वर अपनी पवित्र समुदाय के लिए स्पष्ट मानदंड स्थापित करता है। परमेश्वर यह चाहता है कि विश्वासयोग्यता के साथ जुड़ी कलीसिया अलग-अलग पापों के साथ सहवास न बनाये, ताकि समाज में पवित्रता बनी रहे और असत्य के पथ पर चलने वाले लोगों के लिए भी स्पष्ट चेतावनी रहे।
शब्दों का सरल अर्थ
प्रमुख विचार (Cross-references के साथ)
1) मत्ती 18:15‑17 — पापी को समुदाय के भीतर उपाय कैसे करें; विश्वासी व्यवस्था में समस्या उठे तो निर्णय प्रक्रिया स्पष्ट की जाती है।
2) रोम 16:17 — ऐसी बातों से दूर रहने की चेतावनी जो विश्वास-समुदाय की एकता को नुकसान पहुँचाती हैं।
3) 2 थिस्स 3:6 — अनुदेशमान कार्यों से दूर रहने की प्रेरणा; अनाज्य व्यवहार से दूरी बनाये रखना।
पवित्रता और प्रेम के बीच संतुलन
यह निर्देश कठोर प्रतीत हो सकता है, पर यह उद्देश्य पवित्र समुदाय की रक्षा है। फिलीस्तीन की चर्चों में भी यह विचार बार-बार उठे: किस हद तक सामाजिक सहभागिता बनाए रखें जबकि नैतिक आचरण का उल्लंघन हो। प्यार और अनुशासन के बीच संतुलन बनते हुए, ग़लत कर्म में शामिल होने वाले सदस्य के लिए स्पष्ट चेतावनी और मार्गदर्शन का प्रयोग आवश्यक है।
आज के संदर्भ में व्यवहारिक अनुप्रयोग
यथार्थ सार
पौलुस का उद्देश्य है कि कलीसिया पवित्र हो और भीतर किसी तरह का असंतुलन न रहे। साथ ही, विश्वासियों के लिए सच्चे प्रेम और सुधार की राह भी बनी रहे। जब सामाजिक साथ छोड़ना पड़े, तो वह प्रेम-मेघ बनकर भी अपने उद्देश्य को प्रभावित न होने दे।
मैथ्यू हेनरी, अलेबार्न्स और एडम क्लार्क के सार्वजनिक-डायरेक्ट उद्धरण: - “कलीसिया में पाप के साथ सह-अस्तित्व स्वीकार नहीं किया जा सकता; पवित्रता के लिए दूरी आवश्यक है।” (Matthew Henry) - “जो संदेश देता है कि पाप को सामान्य समझना और संगत बनना उचित है, उसे निरस्त करना चाहिए ताकि चर्च की भलाई बनी रहे।” (Albert Barnes) - “यथार्थ प्रेम वही है जो गलत कर्मों के विरुद्ध स्पष्ट नहीं, बल्कि सुधार की दिशा में निरंतर नेतृत्व दे।” (Adam Clarke)