Old Testament
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प्रेरितों के काम 1 प्रेरितों के काम 2 प्रेरितों के काम 3 प्रेरितों के काम 4 प्रेरितों के काम 5 प्रेरितों के काम 6 प्रेरितों के काम 7 प्रेरितों के काम 8 प्रेरितों के काम 9 प्रेरितों के काम 10 प्रेरितों के काम 11 प्रेरितों के काम 12 प्रेरितों के काम 13 प्रेरितों के काम 14 प्रेरितों के काम 15 प्रेरितों के काम 16 प्रेरितों के काम 17 प्रेरितों के काम 18 प्रेरितों के काम 19 प्रेरितों के काम 20 प्रेरितों के काम 21 प्रेरितों के काम 22 प्रेरितों के काम 23 प्रेरितों के काम 24 प्रेरितों के काम 25 प्रेरितों के काम 26 प्रेरितों के काम 27 प्रेरितों के काम 28Verse
प्रेरितों के काम 23:1 प्रेरितों के काम 23:2 प्रेरितों के काम 23:3 प्रेरितों के काम 23:4 प्रेरितों के काम 23:5 प्रेरितों के काम 23:6 प्रेरितों के काम 23:7 प्रेरितों के काम 23:8 प्रेरितों के काम 23:9 प्रेरितों के काम 23:10 प्रेरितों के काम 23:11 प्रेरितों के काम 23:12 प्रेरितों के काम 23:13 प्रेरितों के काम 23:14 प्रेरितों के काम 23:15 प्रेरितों के काम 23:16 प्रेरितों के काम 23:17 प्रेरितों के काम 23:18 प्रेरितों के काम 23:19 प्रेरितों के काम 23:20 प्रेरितों के काम 23:21 प्रेरितों के काम 23:22 प्रेरितों के काम 23:23 प्रेरितों के काम 23:24 प्रेरितों के काम 23:25 प्रेरितों के काम 23:26 प्रेरितों के काम 23:27 प्रेरितों के काम 23:28 प्रेरितों के काम 23:29 प्रेरितों के काम 23:30 प्रेरितों के काम 23:31 प्रेरितों के काम 23:32 प्रेरितों के काम 23:33 प्रेरितों के काम 23:34 प्रेरितों के काम 23:35



प्रेरितों के काम 23:8 — संदिग्ध मतभेद
पद का तुरंत संदर्भ: प्रेरितों के काम में यह संदेशन पप्लस की राजधानी के समय शास्त्रीय बहस के दौरान आया है, जब पॉल अदालत में दृष्टिगत हो रहा था और सीनियर सलाहकारों के बीच धार्मिक धारणाओं पर चर्चा चल रही थी। इस पंक्ति में सदूकी कहते हैं कि न पुनरुत्थान है, न स्वर्गदूत और न आत्मा है; परन्तु फरीसी इन सबको मानते हैं।
ईश्वर और विश्वास के बारे में यह वह स्पष्ट संदेश है जो दिखाता है
यह क्रिया-धारा बताती है कि प्रभु के लोग विविध मत रखते हैं और फिर भी एक साथ समुदाय बनाते हैं। विश्वास की केंद्रीय धारा—पुनरुत्थान, स्वर्गदूत, आत्मा—इनपर मतभेदों के बावजूद क्रिस्टीयता की एकता को चुनौती देती है। परिणामस्वरूप, चर्च में विरोध-समाधान के लिए नैतिकता, अधिमान्यता और निर्भयता की आवश्यकता उभरती है: सत्य को दबाने की कोशिश न करके, उसे समझकर स्वीकारना।
मुख्य शब्दों और चित्रों की व्याख्या
संबंधित वचन
यहां के विचारों से जुड़ी कुछ अन्य जगहें हैं जहां पुनरुत्थान और आत्मा के विषय उभरते हैं:
इन स्थानों का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि ईश्वर की योजना में पुनरुत्थान, स्वर्गदूत और आत्मा—तीनों का महत्व है, भले ही समूह में मतभेद हों।
आज के संदर्भ में उपयोग
हम अपने समुदाय में कुछ बातें देख सकते हैं: मतभेद स्वाभाविक हैं, परिजन एक मार्ग पर कैसे चलें—यह परख है। विश्वास की गहराई को बनाए रखने के लिए हमें: - सत्य को नम्रता से उद्घाटन देना चाहिए, - आवश्यकता पड़ने पर दूसरों के विचारों को सुनना और समझना चाहिए, - दैवीय नियोजन पर भरोसा बनाए रखना चाहिए कि परमेश्वर अपनी योजना स्पष्ट करता है।
पूर्व-लेखक-छवि का संचित सार
मत्ती हार्नी (Matthew Henry), अॅल्बर्ट बार्न्स (Albert Barnes) और एडम क्लार्क (Adam Clarke) के सार्वजनिक-डायरेक्ट टिप्पणीयों से प्राप्त सामान्य अंतर्दृष्टि इस प्रकार मिलती है: कहानी में विश्वासियों के बीच मतभेद होते हैं, परंतु पक्का सत्य—पुनरुत्थान, स्वर्गदूत और आत्मा—ईश्वर की प्रकृति और क्रिया का भाग हैं। इन टिप्पणियों का केंद्र यह है कि प्रभु की सच्चाई पर क्रोध के बजाय समझ और प्रेम से काम लेना चाहिए। उद्धरणों के तौर पर यदि आवश्यक हो, तो उपलब्ध छोटे उद्धरण नीचे दिए जा सकते हैं, पर पूर्ण पाठ नहीं।
कटौतीयोग्य बिंदु: यदि आप चाहें, तो मैं Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के छोटे-छोटे उद्धरणों को इस पंक्ति के सुसंगत हिस्से के साथ जोड़ दूँ, बशर्ते वे संपूर्ण पाठ की जगह ब्रह्मांड के साक्ष्यों के अनुसार हों।
सार
यह पद हमें स्मरण कराता है कि सत्य विविधता में एकता से बनता है। ईश्वर को जानना और उसकी योजना के अनुसार चलना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए, न कि मतभेदों के कारण विभाजित होना।