Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
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दानिय्येल 6:14 — संदर्भ के साथ व्याख्या
पद संदर्भ दानिय्येल 6:14 में दानिय्येल के लिए अदालत-राजा दिग्गजों के षड़यंत्र के समय भी ईश्वर-वचन की साठी रहता है। जब दारेन द्वारा बनवाया गया नियम कथानक में किया गया था कि 30 दिन तक किसी मनुष्य के लिए प्रार्थना न्यायालय से बाहर नहीं होगी, तब भी दानिय्येल ने यहूदी प्रथा के अनुसार अपने राज-घर की खिड़की से पलकों को उठाकर परमेश्वर के समक्ष प्रार्थना की। यह सुनकर राजा ने अत्यंत उदासी व्यक्त की और बचाव के उपाय देखने लगा; सूर्य अस्त होने तक वह दानिय्येल को बचाने का प्रयास करता रहा।
मुख्य विचार
यह पद दो प्रमुख धारणाओं को उभारता है: ईश्वर के प्रति निष्ठा बनाये रखने की उत्कटता और मानवीय विवेक का दवा-सा संघर्ष। दानिय्येल ने बाहरी दबाव के बावजूद ईश्वर की उपेक्षा नहीं की; राजा के दिल में उदासी दिखती है कि वह एक निष्पक्ष भय से ही नहीं, बल्कि ईश्वर के विरुद्ध प्रतिशोध की राजनीति से भी आहत था। संदेश यह है कि परमेश्वर की आज्ञाओं के अनुसार जीवन जीना, चाहे परिणाम कैसे भी हों, हमारे विश्वास की गहराई को परखता है।
तीन प्रमुख विषय
संबद्ध पाठ
– दानिय्येल 3:17-18: निर्णायक टेस्ट में तीन betrouwbaarheid — निष्ठा बनाम अहंकार।
– फसह 1:8-9: भय के बीच भी देवता का स्मरण और आस्था।
– मत्त 6:33: परमेश्वर के राज्य और उसकी righteousness पहले रखें, फिर सब कुछ सम्हाल लिया जाएगा।
व्यावहारिक चिंतन
हम में से कई बार सुरक्षा, मनोवृत्ति और सामाजिक दबाव के कारण सच से दूर हो जाते हैं। दानिय्येल की तरह हमें भी हर परिस्थिति में प्रार्थना और नैतिकता को जीवंत रखना चाहिए। अगर परिणाम विपरीत हों तो भी ईश्वर के प्रति भरोसा बना रहना चाहिए, क्योंकि वह वही है जो हमें संकट के समय भी सहायता देता है।
क्रॉस-रेफरेंसेस और सरल व्याख्या
– दानिय्येल 6:10 से सीख मिलती है कि साधारण दिनचर्या में भी प्रार्थना और विश्वास की प्रथाओं को बनाए रखना अच्छा है।
– दानिय्येल 3:28 में_GATE दिखता है कि परमेश्वर उन लोगों को बचाता है जो उसकी आज्ञाओं के अनुरूप चलते हैं।
संक्षिप्त निष्कर्ष
यही संदेश है कि विश्वास की दशा चाहे जैसी भी हो, ईश्वर की प्रार्थना और नैतिकता को प्राथमिकता देना चाहिए। दानिय्येल ने दिखा दिया कि पृथ्वी की राजनेता भी परमेश्वर के सामने नतमस्तक हो जाते हैं जब सच प्रवाह और विश्वास के साथ चलता है।