Old Testament
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व्यवस्थाविवरण 16:19 — न्याय, पक्षपात और घूस
पद्य का संदर्भ: यह आयत किसी राजा, अधिकारी या अदालत के लिये है जो समाज में न्याय को स्थापित करने का उत्तरदायित्व संभालता है। यहाँ "तुम न्याय न बिगाड़ना" और "तू न तो पक्षपात करना" तथा "न घूस लेना" के शब्द सत्ता के भीतर ईमानदारी और निष्पक्षता की अनिवारिता बताते हैं। घूस के माध्यम से बुद्धिमान की आँखें अन्धी और धर्मियों की बातें पलट जाती हैं—यानी अधर्म के पक्ष में झुकना, सत्य से विमुख होना और न्याय का मोल घट जाना।
धर्म और व्यवहार का गूढ़ संकेत
ईश्वर के प्रति यह शास्त्र बताता है कि न्याय की नींव स्पष्टता, निष्कपटता और निष्कलंक नैतिकता है। सत्ता-व्यवस्था में भ्रष्टाचार से समाज में भय और विश्वास की कमी आती है। यह आयत सरल शब्दों में बताती है कि अधिकार-संपन्न व्यक्ति भी सत्ता के दमन से नहीं बच सकते; इसलिए नैतिक आचार-विचार के उच्च मानदंड आवश्यक हैं।
मुख्य शब्दों का स्पष्टीकरण
अनुसरणीय पठन: Related Passages
यहाँ तीन उपयुक्त संदर्भ दिए जाते हैं, जो न्याय और निष्पक्षता के सिद्धांतों को पूरक बनाते हैं:
पवित्र लेखन-समझ का सार
गूढ़ शिक्षा यही उद्धृत करती है कि ईश्वर शासन वही मानता है जो निष्पक्ष, निष्कपटन और भ्रष्टाचार-निरपेक्ष हो। घूस लेना केवल व्यक्तिगत लाभ नहीं बढ़ाता, बल्कि सामाजिक ढांचे को हानि पहुँचाता है। इसलिए राजा-नेता और नागरिक दोनों पर यह आग्रह है कि वे लोहमय लाभ के बजाय सत्य, दया और निष्पक्ष न्याय को प्राथमिकता दें।
आज के लिए अनुप्रयोग
संक्षेप
व्यवस्थाविवरण 16:19 हमें याद दिलाता है कि निष्पक्षता ही वास्तव में शासन की कुंजी है। धर्म, सत्ता और समाज सभी एक दूसरे पर निर्भर हैं; भ्रष्टाचार से बचना ईश्वर के नियमों के अनुरूप जीवन जीना है।