Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
व्यवस्थाविवरण 1 व्यवस्थाविवरण 2 व्यवस्थाविवरण 3 व्यवस्थाविवरण 4 व्यवस्थाविवरण 5 व्यवस्थाविवरण 6 व्यवस्थाविवरण 7 व्यवस्थाविवरण 8 व्यवस्थाविवरण 9 व्यवस्थाविवरण 10 व्यवस्थाविवरण 11 व्यवस्थाविवरण 12 व्यवस्थाविवरण 13 व्यवस्थाविवरण 14 व्यवस्थाविवरण 15 व्यवस्थाविवरण 16 व्यवस्थाविवरण 17 व्यवस्थाविवरण 18 व्यवस्थाविवरण 19 व्यवस्थाविवरण 20 व्यवस्थाविवरण 21 व्यवस्थाविवरण 22 व्यवस्थाविवरण 23 व्यवस्थाविवरण 24 व्यवस्थाविवरण 25 व्यवस्थाविवरण 26 व्यवस्थाविवरण 27 व्यवस्थाविवरण 28 व्यवस्थाविवरण 29 व्यवस्थाविवरण 30 व्यवस्थाविवरण 31 व्यवस्थाविवरण 32 व्यवस्थाविवरण 33 व्यवस्थाविवरण 34Verse
व्यवस्थाविवरण 17:1 व्यवस्थाविवरण 17:2 व्यवस्थाविवरण 17:3 व्यवस्थाविवरण 17:4 व्यवस्थाविवरण 17:5 व्यवस्थाविवरण 17:6 व्यवस्थाविवरण 17:7 व्यवस्थाविवरण 17:8 व्यवस्थाविवरण 17:9 व्यवस्थाविवरण 17:10 व्यवस्थाविवरण 17:11 व्यवस्थाविवरण 17:12 व्यवस्थाविवरण 17:13 व्यवस्थाविवरण 17:14 व्यवस्थाविवरण 17:15 व्यवस्थाविवरण 17:16 व्यवस्थाविवरण 17:17 व्यवस्थाविवरण 17:18 व्यवस्थाविवरण 17:19 व्यवस्थाविवरण 17:20



संक्षिप्त अर्थ
व्यवस्थाविवरन 17:12 बताता है कि याजक या न्यायी की उपस्थिति में अभिमान दिखाने और उनके आदेशों को अस्वीकार करने पर कड़ी सजा है; यह प्रावधान इस्राएल में परमेश्वर के कानून की मान्यता और उसकी संस्था-गत व्यवस्था की महत्ता को स्थापित करता है। अधिकार-संस्थाओं के प्रति अवमानना के परिणाम स्पष्ट हैं—चाहे वह धार्मिक अधिकारी हों या कानूनी निर्णय देते अधिकारी; यह समाज के लिए खतरे की घंटी है और व्यवस्था में अनुशासन बनाये रखने के लिए आवश्यक माना गया है।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यह क़ानून यह बताता है कि जब भी धार्मिक नेताओं या न्यायिक अधिकारों के प्रति अविश्वास या उनकी उपस्थिति में अभिमान प्रकट किया जाए, तो वह व्यक्तिगत और सामाजिक बुराई का स्रोत बन सकता है। व्यवस्था के प्रधान उद्देश्य में श्रद्धा, यथार्थ प्रवर्तन और सामुदायिक सुरक्षितता शामिल है। यहाँ यह भी संकेत है कि मान्यता प्राप्त संस्थाओं के आदेशों का सम्मान न करना न सिर्फ व्यक्तिगत पाप है, बल्कि समाज की एकता और प्रशासन की प्रभावशीलता के विरुद्ध भी है।
व्याख्यात्मक निरीक्षण
छोटे विषय-सार
अन्य संबद्ध आयतें
1) अन्य कानून जो संस्थागत सम्मान पर बल देते हैं—कथन यह है कि प्रभु के प्रतिनिधियों के प्रति अविश्वास सामाजिक असंतुलन उत्पन्न कर सकता है। (उद्धरण नहीं दिया गया)।
2) न्याय और शासन के महत्वपूर्ण क्षण—समुदाय की सुरक्षा और पवित्रता के लिए निर्णय-प्रक्रिया में धार्मिक नेताओँ की भूमिका महत्वपूर्ण मानी जाती है।
क्लासिक टिप्पणी-आइडिया (संयोजन)
मैथ्यू हेनरी, अॉल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क के सार्वजनिक-डायरेक्ट टिप्पणी-स्वर से यह विचार सामने आता है कि इस प्रकार का कानून समाज में उचित सम्मान और सचेतन नियंत्रण स्थापित करने के लिए है; संस्थाओं के प्रति अवहेलना से सामाजिक गतिशीलता प्रभावित होती है।
सीधी उद्धरण (संभवतः—केवल यदि उपलब्ध हों)
“The honor and obedience due to the officers of God’s house is the mainstay of public worship and civil order.” (इस प्रकार के सार को समेकित समझ में लिया जा सकता है; यह सारांश बराबर स्रोत के सीधे उद्धरण के रूप में नहीं दिया गया है।)
व्यावहारिक निष्कर्ष
यदि हम परमेश्वर की व्यवस्था के संरक्षण के लिए बने सामाजिक-धार्मिक पदों का सम्मान नहीं करते, तो समाज में असंतुलन और बुराइयों को बढ़ावा मिलता है। आज भी हर समुदाय में धार्मिक-नेतृत्व और कानूनी अधिकारियों के प्रति सम्मान और उनके निर्देशों का पालन आवश्यक है ताकि नैतिकता और सुरक्षा बनी रहे।
पठन-संबंध
रोमियों 13:1-2—नागरिक नियमों के पालन का स्पष्टीकरण; याजक-नेतृत्व के प्रति सम्मान की गहराई। गलत-आचरण के सामाजिक परिणामों पर विचार।; सभोवर्ग 24:11—लोक-कल्याण के लिए व्यवस्था-पालन की प्रेरणा।