Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
व्यवस्थाविवरण 1 व्यवस्थाविवरण 2 व्यवस्थाविवरण 3 व्यवस्थाविवरण 4 व्यवस्थाविवरण 5 व्यवस्थाविवरण 6 व्यवस्थाविवरण 7 व्यवस्थाविवरण 8 व्यवस्थाविवरण 9 व्यवस्थाविवरण 10 व्यवस्थाविवरण 11 व्यवस्थाविवरण 12 व्यवस्थाविवरण 13 व्यवस्थाविवरण 14 व्यवस्थाविवरण 15 व्यवस्थाविवरण 16 व्यवस्थाविवरण 17 व्यवस्थाविवरण 18 व्यवस्थाविवरण 19 व्यवस्थाविवरण 20 व्यवस्थाविवरण 21 व्यवस्थाविवरण 22 व्यवस्थाविवरण 23 व्यवस्थाविवरण 24 व्यवस्थाविवरण 25 व्यवस्थाविवरण 26 व्यवस्थाविवरण 27 व्यवस्थाविवरण 28 व्यवस्थाविवरण 29 व्यवस्थाविवरण 30 व्यवस्थाविवरण 31 व्यवस्थाविवरण 32 व्यवस्थाविवरण 33 व्यवस्थाविवरण 34Verse
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व्यवस्थाविवरण 18:17—सरल अर्थ
इस verses में कहा गया है कि जब बपतिस्मा, भविष्यवाणी या किसी भी असली प्रेरणा के दायरे में यह स्पष्ट हुआ कि जो कुछ कहा जा रहा है, वह सत्य और भरोसेमंद है, तब यहोवा निश्चय कहता है: वे जो कुछ कहते हैं वे ठीक कहते हैं। इसका तात्पर्य यह है कि यदि संदेश सीधे और स्पष्ट रूप से परमेश्वर के सत्य के अनुरूप हो, तो उसकी सत्यता और विश्वसनीयता मान्य मानी जाती है।
प्रसंगगत पृष्ठभूमि
व्यवस्थाविवरण तीनों मुख्य भागों—शासन, विधान और भविष्यवाणी—में लेखक मोशे के नेतृत्व में यह बताता है कि यहूदियों के बीच कौन-सी बातें सत्यापित मानी जाएँगी। इधर-उधर बहुधा भ्रम और गलत वक्तव्य होते रहे हैं; इस संदेश से स्पष्ट किया गया है कि सत्य और प्रेरणा की जाँच देने वाले मानक क्या हैं: जो बात सत्य से संगत हो और परमेश्वर की इच्छा को प्रकट करे, वही मान्य।
व्याक्ष्य-आलोचनात्मक विवेचन
यहा एक सरल विचार उभर कर आता है—आवाज़ कितनी भी प्रबल या सावधान क्यों न हो, यदि वह परमेश्वर के वचन के अनुरूप नहीं है, तो वह सत्यापन योग्य नहीं। किन्तु यदि कोई कथन ईमानदारी से सत्य के साथ संगत है, तो उसे मान्यता दी जाए। इस प्रकार का मानदंड नैतिकता, न्याय और समुदाय की सुरक्षा के लिए आवश्यक है, ताकि गलत वक्तव्य से समूह का विनाश न हो।
छोटा thematic सूची
संबद्ध अवतरण और उनका संक्षिप्त स्पष्टीकरण
– हैनरी की दृष्टि: यह लोक-केवल सत्य की पुष्टि का बुनियादी मानक है; जो कथन परमेश्वर के मन के अनुरूप हो, वह योग्य है।
– जॉन ब्रैन्ज़ की टिप्पणी: सत्य और प्रेरणा को अलग करने के लिए जाँच की कसौटी नैतिक और धार्मिक स्वतंत्रता की सुरक्षा करती है।
– एडम क्लार्क का अवलोकन: यह निर्देश विशिष्ट ढंग से भिन्न-भिन्न वक्ताओं की जिम्मेदारी तय करता है कि वे अपने दावे को ईश्वरत्व की कसौटी पर टिकाएं।
क्रॉस-रेफरेंसेस (संक्षेप) और उनका तात्पर्य
1) नियम 22:17 — जो शब्द सत्य और पुष्टि के साथ आए, उसे ग्रहण किया जाए; अन्यथा उसे ठुकराया जाए।
2) लूका 21:8 — सत्य को गलत जालों से भेदना; चेतावनी दी जाती है कि कौन-सी बातें मनुष्यों की प्रेरणा से होंगी और कौन-सी परमेश्वर की।
3) 1 जेम्स 3:17 — परमेश्वर की बुद्धि शांत और पवित्र होती है; दावे के पीछे ईमानदार प्रेम और पवित्र विवेक हो।
संक्षिप्त व्यवहारिक निष्कर्ष
जो कुछ भी हमारे समक्ष आए, उसे परखने के लिए यह आधार बने: क्या यह संदेश परमेश्वर के वास्तविक हृदय और नियम के अनुरूप है? अगर हाँ, इसे स्वीकार करें; अन्यथा क्रोधित या भ्रमित न हों। अपने समुदाय और विश्वास की सुरक्षा के लिए सतर्क रहें कि असत्य के बहाने आपकी सच्चाई कमजोर न पड़े।
नोट: इस पाठ के लिए Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संक्षिप्त उद्धरण केवल आवश्यक जगहों पर शामिल किए गए हैं।