Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
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वह सूत्र जो स्पष्ट करता है: वह नबी Yahweh के नाम से जो कहे, उसका सत्यापन
व्यवस्थाविवरण 18:22 कहता है: जब कोई नबी यहोवा के नाम से कहे और उसका वचन घटे या असत्य निकले, तो वह वचन यहोवा का नहीं; ऐसे नबी ने अभिमान से यह कहा है, इसलिए उससे डरना नहीं चाहिए।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
गिनती-यस्तो धार्मिक कानूनों के बीच यह अध्याय नबी-उत्पन्न भ्रामक बातों और सत्य-झूठ की जाँच पर केंद्रित है। उस समय इस्राएल के लोग नबियों के मार्गदर्शन पर चलते थे, परन्तु यहोवा के नाम से बात करने वाले अनेकों prétendants उभरते थे। इसे स्पष्ट करने के लिए परमेश्वर ने नियम रखा कि यदि कोई नबी यहोवा के नाम से बोलकर भविष्यवाणी करे और वह बात न पूरी हो, तो उसे गलत समझना चाहिए; यह तुलना न केवल दायित्व और सत्यता की है, बल्कि वेदना और चेतावनी का संदेश भी देता है कि अभिमान से बोले गए वचनों से सावधान रहना चाहिए।
मुख्य interpretive observations
संयोगित विचारधारा—थीम का छोटा सार
अनुरूप cross-references
1) नियम 18:21-22: यह अध्याय उसी सीमा-रेखा को स्पष्ट करता है कि नबी के संदेश की जाँच कैसे की जाए। यह अन्यायपूर्ण दावे के विरुद्ध प्रमाण देता है।
2) यूहन्ना 14:6: सत्य और मार्ग स्पष्ट है—येसु स्वयं मार्ग, सत्य और जीवन है; यहाँ नबी के कथन की परख से अन्य छोड़ नहीं किया गया।
3) निर्गमन 4:12: परमेश्वर के बुलावे में बोलना, परन्तु यह भी कि यदि वह वचन नहीं मिलता, तो उसे अधूरा मानना चाहिए—परिस्थितियों में प्रभु-निर्णय की भूमिका स्पष्ट है।
सारगर्भित निष्कर्ष—व्यावहारिक takeaway
खास तौर पर हमारी वर्तमान जीवन-परिस्थितियों में भी यह शिक्षा देता है कि जो कुछ भी आध्यात्मिक प्रमाण बनकर आता है, उसे परखा जाए, और किसी भी नुभावित अभिमान के साथ नहीं बोला जाए। Jehová के नाम से कहे गए शब्दों की सच्चाई के लिए स्पष्ट मापदंड जरूरी है, ताकि विश्वास और प्रामाणिकता बनी रहे।
संक्षेप में—लेखन का एक नियम
यदि कोई भविष्यवाणी पूरी न हो, तो उसे यहोवा के नाम से कहा गया ठहराना उचित नहीं; यह एक चेतावनी है कि अभिमान या गलत निर्णय से संदेश नहीं बनता।
ईमानदार, परखने योग्य कल्पना और संयमित आस्था से ही सच्ची राह बनती है।
नोट: इस पवित्र पाठ के साथ बने रहने वाले कुछ पुरानी-उद्धृत टिप्पणियाँ (एडलम-हेनरी, आलबर्ट बार्न्स, एडम क्लार्क) क्रमशः अपने-अपने शब्दों में आये हैं; यदि आप चाहें तो मैं उनके संबद्ध अंशों का संक्षेप रूपांतरण दे दूँ।