Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
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व्यवस्थाविवरण 25:16 — संदर्भ व सार
त्वरित संदर्भ: यह वचन उस समय के कानून-प्रणाली के भीतर आता है जब इजराईल के समाज में विभिन्न हितों और व्यवहारों के लिए स्पष्ट नैतिक मानक बनाए गए। यह स्पष्ट करता है कि परमेश्वर के यहाँ सच्चे न्याय का आधार चरित्र और इरादा है, न कि केवल औपचारिक कर्म।
सूचना: परमेश्वर और विश्वास का दृश्य
यह पद यह बताता है कि परमेश्वर अपने लोगों के व्यवहार को उसकी दृष्टि में फलते-फूलते और उचित-न्यायपूर्ण रूप से देखता है। जो लोग धोखा, छल, या कुटिलता के साथ व्यवहार करते हैं, वे उसे घृणित लगते हैं। ईमानदारी और सत्य ही आस्था के जीवंत प्रमाण हैं; वरना विवरण से परे जाकर भी चरित्र की परख की जाती है। इस वाईट, जीवन के हर क्षेत्र में अधर्म का व्यवहार परमेश्वर के सामने अस्वीकार्य है, भले ही वह सामाजिक या आर्थिक दबावों के कारण क्यों न हो।
शब्दों और imagery की स्पष्टता
“कुटिलता” और “घृणित” शब्द दो पक्ष दिखाते हैं: उसके भीतर छिपी चालाकी और बाहरी दिखावटी पाप। यह चेतावनी देता है कि परमेश्वर न केवल क्रिया-प्रणाली बल्कि दिल की प्रेरणा को भी देखता है। धार्मिक परंपरा में यह सुझाता है कि किसी भी छल-व्यवहार से ईश्वर के सामने विश्वसनीयता और सच्चे प्रेम की कमी प्रकट होती है।
संबंधित आयतें
इन संदर्भों में दिखता है कि परमेश्वर की नैतिक दृष्टि हर समय और हर स्थान पर एक जैसी है: दिल की सच्चाई और व्यवहार की पवित्रता अंततः उसे प्रसन्न करती है।
आज की जीवन-प्रयोगिता
सार-संझाव and एकीकृत निष्कर्ष
यही वचन बताता है कि परमेश्वर के साथ विश्वसनीयता का मूल दिल से उभरता हुआ निर्भीक सत्य है। जितना अधिक हम अपने व्यवहार में सच्चाई और निष्कपटता दिखाते हैं, उतना ही हमारे विश्वास को प्रकट और मजबूत करते हैं। इस आधार पर हम अपने जीवन में छल-छद्म से बचकर समाज और समुदाय के बीच सम्मान और भरोसा बनाए रखते हैं।
उद्धरण-नोट: नीचे दिए गए सार्वजनिक-डायरेक्ट टिप्पणियों में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संक्षिप्त कथन उपलब्ध हो सकते हैं; यदि उनके शाब्दिक उद्धरण हों तो वे केवल आवश्यक और मौजूदा अंश के रूप में ही प्रयुक्त हैं:
“Such practices are an abomination in the sight of God.” — यह स्पष्ट करता है कि धूर्तता ईश्वर की दृष्टि में निन्दित है (संकेतक के रूप में Matthew Henry/Albert Barnes/Adam Clarke की संक्षिप्त बतौर उद्धरण).