Old Testament
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सभोपदेशक 11:3 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
यदि बादल जल भरे हैं, तब उसको भूमि पर उण्डेल देते हैं; और वृक्ष चाहे दक्षिण की ओर गिरे या उत्तर की ओर, तो भी जिस स्थान पर वृक्ष गिरेगा, वहीं पड़ा रहेगा।
सभोपदेशक 11:3 पद-दर-पद बाइबल टीका
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सभोपदेशक 11:3 समानांतर पद और संबंधित वचन
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भजन संहिता 65:9 (HINIRV) »
तू भूमि की सुधि लेकर उसको सींचता है, तू उसको बहुत फलदायक करता है; परमेश्वर की नदी जल से भरी रहती है; तू पृथ्वी को तैयार करके मनुष्यों के लिये अन्न को तैयार करता है।

यशायाह 55:10 (HINIRV) »
“जिस प्रकार से वर्षा और हिम आकाश से गिरते हैं और वहाँ ऐसे ही लौट नहीं जाते, वरन् भूमि पर पड़कर उपज उपजाते हैं जिससे बोलनेवाले को बीज और खानेवाले को रोटी मिलती है, (2 कुरि. 9:10)

लूका 13:7 (HINIRV) »
तब उसने बारी के रखवाले से कहा, ‘देख तीन वर्ष से मैं इस अंजीर के पेड़ में फल ढूँढ़ने आता हूँ, परन्तु नहीं पाता, इसे काट डाल कि यह भूमि को भी क्यों रोके रहे?’
सभोपदेशक 11:3 – पवन-आकाश का संकेत और समय के निर्णय
पद यह बताता है कि आकाश में बादल जहाँ भी घर बनाते हैं, वर्षा उसे ही धो डालती है, और वृक्ष जिस दिशा में गिरते हैं, वही कहीं के लिए तय हो जाता है। यह एक निहित सच्चाई को सरल उदाहरण से प्रस्तुत करता है: परिवर्तन और परिणाम प्रकृति की एक गत्यात्मक चेन हैं, जिससे जीवन के अनिश्चित क्षणों में भी एक प्रकार का क्रम बनता है।
ईश्वर-वcredible फ़ट-फट संकेत या विश्वास की दिशा?
यह पाठ सीधे-सीधे हमें यह सिखाता है कि परिस्थिति चाहे कैसी भी हो, प्रकृति और जीवन के नियम एक ठहरे हुए स्वर से नहीं चलते हैं; किन्तु परमेश्वर की व्यवस्था के अनुरूप वे चलन बनाते हैं। अर्थात, जो भी घटित होता है, वह परमेश्वर के नियंत्रण और नियोजन के भीतर आ कर एक निर्धारित परिणाम देता है। इस संदर्भ में, नैतिकता और व्यवहार के लिए यह एक प्रेरणा है कि हम अनिश्चितता में भी अपनी राह नहीं भटकें, बल्कि ईश्वर की योजना के अनुरूप धैर्य और विवेक बनाए रखें।
महत्वपूर्ण शब्दों और imagery की स्पष्टता
अनुक्रमित संदर्भ बातें
यहाँ के विचार से जुड़ी कुछ प्रामाणिक साझा बातें अन्यग्रंथों के समान निष्कर्ष देती हैं:
Cross-references के साथ संक्षिप्त स्पष्टीकरण
आज के संदर्भ में अनुप्रयोग
1) जब भी भविष्य अस्पष्ट लगे, तो याद रखें कि नीचे गिरने-उत्पन्न होने वाले परिणाम भी परमेश्वर के नियंत्रण में होते हैं। आपके प्रयास, निर्णय और वक़्त—तीनों का संयोजन आपके भाग्य का निर्माण करता है।
2) धैर्य और विवेक बनाए रखें, खासकर तब जब परिस्थितियाँ अनिश्चित हों; आपत्ति के समय भी अच्छाई की दिशा में कदम बढ़ाने का निर्णय लें।
3) जीवन के हर अवसर में—चाहे जैसा भी मौसम हो—अपने संबंध ईश्वर के साथ मजबूत रखें और अपने कर्म को निर्देशित करें ताकि परिणामों के प्रति आत्म-विश्वास बना रहे।
संक्षेप-उपसंहार
इस परिसर का संदेश यह है कि बाहरी घटनाओं की दिशा-घड़ी स्वतः तय नहीं होती; बल्कि वे परमेश्वर के नियोजन के अंतर्गत क्रम बनाती हैं। इसलिए अति-आशंकाओं के बीच भी ईश्वर में विश्वास बनाए रखें, और हर परिस्थिति में धैर्य से आगे बढ़ें।
महत्वपूर्ण उद्धरण (पूर्व-स्वतंत्र व्याख्याओं में से): इस पाठ के सार को समझने में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के समानंद विचार प्रेरणास्पद रहते हैं; उनके उपायों में मूलतः यह बिंदु उठता है कि प्रकृति के नियम और ईश्वर की योजना एक दूसरे से मिलकर जीवन के क्रम को निर्धारित करते हैं।