Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीसभोपदेशक 6:7 बाइबल पद की व्याख्या
सभोपदेशक 6:7 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
मनुष्य का सारा परिश्रम उसके पेट के लिये होता है तो भी उसका मन नहीं भरता।
सभोपदेशक 6:7 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
सभोपदेशक 6:7 समानांतर पद और संबंधित वचन
उन बाइबल पदों को देखें जो विषय, शिक्षा या संदर्भ के आधार पर इस अंश से जुड़े हैं। समानांतर पदों की तुलना करने से इस वचन के संदर्भ और संदेश को अधिक गहराई से समझने में सहायता मिलती है। किसी चित्र को चुनें और संबंधित पद, उसकी व्याख्या तथा पद-दर-पद बाइबल टीका देखें।

यूहन्ना 6:27 (HINIRV) »
नाशवान भोजन के लिये परिश्रम न करो*, परन्तु उस भोजन के लिये जो अनन्त जीवन तक ठहरता है, जिसे मनुष्य का पुत्र तुम्हें देगा, क्योंकि पिता, अर्थात् परमेश्वर ने उसी पर छाप कर दी है।”

नीतिवचन 16:26 (HINIRV) »
परिश्रमी की लालसा उसके लिये परिश्रम करती है, उसकी भूख तो उसको उभारती रहती है।

सभोपदेशक 6:7 पर चर्चा – मनुष्य के परिश्रम की प्रकृति
पूर्वावलोकन: सभोपदेशक (नीतिवचन) किताब में लेखक जीवन की अस्थिरता, वैराग्य और सांसारिक इच्छा-लिप्सा की निस्सारता पर गहराई से विचार करता है। इस संदर्भ में 6:7 बताता है कि मानव के सभी परिश्रम का मूल उद्देश्य शरीर की भूख को तृप्त करना है, फिर भी मन नहीं भरता। यह verse सांसारिक उत्पन्नियों के चक्र के विरुद्ध एक विवेकपूर्ण निरीक्षण प्रस्तुत करता है: चाहे धन, भोजन, संपत्ति या आराम—सब कुछ एक बार पूरा होते हुए भी मन एक संतुष्टि की सीमा से आगे बढ़ना चाहती है।
पंक्ति-स्तर पर समझना
“मनुष्य का सारा परिश्रम उसके पेट के लिये होता है तो भी उसका मन नहीं भरता।” यह कथन तीन प्रमुख विचारों को उभारता है: परिश्रम का लक्ष्य (भूख की संतुष्टि), वास्तविक परिणाम (तृप्ति की कमी), और अन्ततः मानसिक तृप्ति की अपर्याप्तता। लेखक यह नहीं कह रहा कि परिश्रम गलत है, बल्कि यह बताता है कि परमजीवन के लिए वैयक्तिक संतुष्टि आत्मिक दृष्टि से मिलनी चाहिए, वरना भौतिक उपलब्धियाँ भी स्थायित्व नहीं दे सकतीं।
मुख्य आध्यात्मिक पाठ
अनुदेश और तुलनात्मक पथ
अन्य पवित्र ग्रंथों में भी वही ध्वनि मिलती है कि सांसारिक उपलब्धियाँ अंततः असंतोष देती हैं जब भीतर की आत्मा परम सत्य को नहीं पाती। उदाहरण के लिए, पेयस्तर में जहां “वह जो कुछ पाता है, उसे अपने अंतर्दर्शन के साथ नहीं जोड़ पाते” जैसी बातें आती हैं, वहीं याकूब 4:1–3 में कहा गया है कि शारीरिक इच्छा और ईर्ष्या से संघर्ष होता है। इस विचार का सार यही है कि बाहरी परिश्रम और खुशी से अधिक, आत्मिक समृद्धि और परमेश्वर के पक्ष से संतोष आवश्यक है।
व्यावहारिक अनुप्रयोग
क्रॉस-रेफरेंसेस और उनके अर्थ
- अन्य नजदीकी संदर्भ, जैसे भजन 55:23 और मत्ती 6:19–21, इंसान की संसाधनों के साथ संतोष और आंतरिक सुरक्षा के बारे में संकेत देते हैं—जो सांसारिक संपत्ति पर निर्भर न होकर परमेश्वर के राज्य पर टिके रहते हैं।
- याकूब 4:1–3 बताता है कि लोलुपता के कारण मतभेद और ईर्ष्या उभरती है; यह verse इस विचार को पुनः पुष्टि करता है कि हृदय की संतुष्टि अक्सर बाहरी उपलब्धियों से अधिक गूढ़ है।
संक्षेप निष्कर्ष
सभोपदेशक 6:7 इस संसार-केंद्रित जीवन के एक अस्थायी सत्य को उजागर करता है: परिश्रम अच्छा है, पर उसकी संतुष्टि केवल पेट तक सीमित नहीं हो सकती। शाश्वत संतुष्टि के लिए हमें आत्मिक उद्देश्य, परमेश्वर के साथ संबंध और क्रिस्तीय प्रेम से परिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। इसी सच के साथ जीना हमें भीतर से पूरक और स्थिर बनाता है।
मुख्य उद्धरण-स्वर: “मनुष्य का सारा परिश्रम उसके पेट के लिये होता है तो भी उसका मन नहीं भरता।” यह पंक्ति स्वयं बताती है कि सही संतोष परमेश्वर-केन्द्रित जीवन में मिलता है, न केवल भूख मिटाने वाले साधनों में।