Old Testament
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सभोपदेशक 6:2 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
किसी मनुष्य को परमेश्वर धन सम्पत्ति और प्रतिष्ठा यहाँ तक देता है कि जो कुछ उसका मन चाहता है उसे उसकी कुछ भी घटी नहीं होती, तो भी परमेश्वर उसको उसमें से खाने नहीं देता, कोई दूसरा ही उसे खाता है; यह व्यर्थ और भयानक दुःख है।
सभोपदेशक 6:2 पद-दर-पद बाइबल टीका
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सभोपदेशक 6:2 समानांतर पद और संबंधित वचन
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सभोपदेशक 5:19 (HINIRV) »
वरन् हर एक मनुष्य जिसे परमेश्वर ने धन सम्पत्ति दी हो, और उनसे आनन्द भोगने और उसमें से अपना भाग लेने और परिश्रम करते हुए आनन्द करने को शक्ति भी दी हो यह परमेश्वर का वरदान है*।

भजन संहिता 17:14 (HINIRV) »
अपना हाथ बढ़ाकर हे यहोवा, मुझे मनुष्यों से बचा, अर्थात् सांसारिक मनुष्यों से जिनका भाग इसी जीवन में है, और जिनका पेट तू अपने भण्डार से भरता है*। वे बाल-बच्चों से सन्तुष्ट हैं; और शेष सम्पत्ति अपने बच्चों के लिये छोड़ जाते हैं।

सहópदेशक 6:2 का अर्थ
सीधा अर्थ है: परमेश्वर किसी व्यक्ति को धन-सम्पत्ति और प्रतिष्ठा देता है, फिर भी उसका मन जो चाहे, वह प्राप्त नहीं कर पाता; किसी और की उसे कठोर नियति खाने को मिल जाती है, और वह व्यर्थ दुःख में पड़ जाता है। इसका तात्पर्य यह है कि सांसारिक आशीषें स्वतंत्र रूप से स्वयं उद्धार और संतुष्टि नहीं दे सकतीं; परमेश्वर की क़ुदरत से पृथक होकर भी वे एक शुष्क, व्यर्थ परिणाम ही बन सकती हैं।
पुष्टिप्रस्तावना (पृष्ठभूमि)
कथा-कहावत में लेखक सभोपदेशक मानव इतिहास के अस्थायित्व और पदार्थ के फरेब का निरीक्षण करता है। यह कहना है कि धन, सम्मान और सुख-सुविधाएँ सिर्फ़ बाहरी आभायें हैं; यदि अंतःकरण और परमेश्वर-भक्ति नहीं, तो वे कुछ नहीं बनतीं। कई बार धन और प्रतिष्ठा लोगों को नियंत्रित कर लेती हैं, और वे अपने मनचाहे को भी नहीं प्राप्त कर पाते, जबकि उनके पास अन्य लोग उनके हिस्से से भोग उठाते हैं।
interpretive observations (व्याख्यात्मक बिंदु)
संक्षिप्त थीम-सूची
related passages — क्रॉस-रेफरेंसेज़ (संक्षिप्त व्याख्या)
1) यहूदा 1:16-17-19 जैसा बनाम धन के लिए लालच के खतरे: धन के लिए लगन से मनुष्य अपने प्रभु से विचलित हो सकता है; यहाँ भी कहा गया है कि केवल परमेश्वर की कृपा से वास्तविक संतोष मिलता है।
2) डाइनेका 8:17-18 — आत्म-गौरव कैसे धन से बढ़ता है; यह बताता है कि धन से आत्म-विश्वास नहीं, बल्कि परमेश्वर की कृपा आवश्यक है।
3) संत पेत्रुस के प्रेरणा-उपदेश: प्रभु के चरणों में विश्वास और नम्रता से जीवन संतुष्ट रहता है, भले ही धन सीमित हो।
छोटे तरीके से व्यावहारिक निष्कर्ष
एक संक्षिप्त समेकन
6:2 एक चेतावनी है कि सांसारिक आशीषें स्वयं में ढेर सारी संतुष्टि नहीं देते; असली जीवन परमेश्वर के साथ सम्बन्ध और उसकी इच्छा में है। लेखक यह दिखाते हैं कि भौतिक सम्पन्नता के बावजूद जीवन का उद्देश्य ईश्वर-आज्ञा में और प्रेमभरे रिश्ते में है।
टिप्पणी स्रोतों से कुछ सार: मॅथ्यू हेनरी, अॅल्बर्ट बार्न्स और एडम क्लार्क—इनमें से प्रत्येक ने धन, Körs और ईश्वर-नियति के बारे में व्याख्या दी है, जो इस पद के मूल मर्म को संदर्भित करते हैं। “कई बार धन और प्रतिष्ठा मिलने पर भी मनुष्य व्यर्थ दुःख में पड़ जाता है,” यह विचार ज्यों-का-त्यों सारगर्भित है।