सभोपदेशक 5:19 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

वरन् हर एक मनुष्य जिसे परमेश्‍वर ने धन सम्पत्ति दी हो, और उनसे आनन्द भोगने और उसमें से अपना भाग लेने और परिश्रम करते हुए आनन्द करने को शक्ति भी दी हो यह परमेश्‍वर का वरदान है*।

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सभोपदेशक 5:19 पद-दर-पद बाइबल टीका

सभोपदेशक 5:19 पर मुख्य interpretive बिंदु

जब परमेश्वर ने धन-सम्पत्ति दी है और उससे आनंद लेने, भागीदारी के अवसर पाकर, और परिश्रम से आनंद प्राप्त करने की शक्ति दी है, तो यह जीवन के earthly blessings को परमेश्वर की देन के रूप में स्वीकार करने का महान महत्व है। निष्कर्ष यह है कि धन या सफलता अपनी-अपनी प्रकृति में शुद्ध नहीं है; उनका सच्चा मूल्य तब है जब हम उन्हें परमेश्वर के अधिकार में रखते हैं, ताकि वे हमारे दैनिक जीवन में संतोष, उदारता और नैतिक जिम्मेदारी के साधन बनें।

पाठ के साहित्यिक संदर्भ (Literary Context)

सभोपदेशक के अंश अक्सर धन-सम्पत्ति, परिश्रम, और जीवन की माया के बीच संतुलन समझाने का प्रयास करते हैं। 5:19 विशेष रूप से उस समय का संकेत देता है जब मनुष्य अपनी मेहनत और संसाधनों से जीवनयापन करता है, और परमेश्वर उसे इन संसाधनों में आनंद उठाने की शक्ति देता है—यह एक “वरदान” के रूप में प्रस्तुत है, न कि एक स्व-उद्धार-यंत्र। यह विचार पुराने नियम और नए नियम की उस धारा से जुड़ते हैं जिसमें सत्य यह है कि धन आपके दिल की न बंधन बन सकता है और न मुक्तिदाता, बल्कि एक उपकरण बन सकता है यदि आपका जीवन परमेश्वर-प्रियता से संचालित हो।

धर्मशिक्षा: theological significance

- आशीर्वाद के रूप में धन: यह verse धन को दैवीय आशीष के रूप में देखता है, जो व्यावहारिक जीवन के साधनों के रूप में प्रयुक्त हो सकता है।
- संतोष और उदारता: धन का उद्देश्य स्वयं के लाभ से परे जाकर दूसरों की सहायता और समाज के कल्याण की ओर भी जाता है।
- दायित्व और सीमा: धन-सम्पत्ति के साथ जिम्मेदारी जुड़ी है—परिश्रम के साथ कमाई पर नियंत्रण और स्वार्थ-नहीं, बल्कि सामुदायिक प्रभाव का विचार।

मुख्य दृष्टिकोण: पुराने‑नए नियमों के बीच

उत्साह-स्तर धन के बारे में उत्तरदायित्व का विचार पुराने नियम परंपरा से जुड़ता है—जैसे वाणी में संतोष और समाज-योजनाओं की चिंता—और नए नियम में परमेश्वर की कृपा के साथ सांसारिक सुविधाओं का सही उपयोग। यह verse व्यक्तिगत सुख के साथ सामाजिक दायित्व को भी जोड़ता है।

आइडिया-सेतु: Cross-references

- गलत लालच से बचना: “मूलधन” को प्रभु से अलग नहीं करना चाहिए; संतुष्टि और ईमानदार लाभ पर जोर देता है। (उच्चस्तर संदर्भ)
- दान और उदारता: धन का सही उपयोग दूसरों के लिए, समुदाय के लिए, ईश्वर की महिमा के लिए। (उद्धृत विचार)
- जीवन के साधनों पर नियंत्रण: परिश्रम, लाभ, और संतोष का संतुलन बनाए रखना चाहिए।

Reflection questions (चिन्तन के प्रश्न)

  • क्या मेरे धन और संसाधन परमेश्वर के एक वरदान के रूप में देखे जाते हैं, या वे मेरे लिए स्वयं उद्देश्य बन गए हैं?
  • क्या मैं अपने लाभ का एक भाग समाज के लाभ के लिए साझा करने के अवसर ढूंढ़ता/ढूंढ़ती हूँ?
  • मेरे दैनिक जीवन में संतोष और उदारता का वास्तविक प्रमाण कैसे प्रकट होता है?

संक्षिप्त निष्कर्ष

धन-सम्पत्ति परमेश्वर का दिया हुआ वरदान हो सकता है, जब इसे व्यक्ति अपने जीवन-दर्शनों के साथ संयमित तरीके से, परमेश्वर की glory के लिए और दूसरों की सहायता के लिए उपयोग करे। परिश्रम, आनंद, और भागीदारी—तीनों का सही संतुलन वह जीवन दर्शाता है जो सांसारिक लाभों को भी ईश्वर के उद्देश्य के अनुरूप चलाता है।

भागीदारी-निर्देश: कौन-सी बातें याद रखें

1) धन को माया नहीं, वरदान समझें; 2) संतोष और उदारता को अपना मोती बनाएँ; 3) परिश्रम के साथ परमेश्वर की कृपा के संकेतों को पहचानें।

उद्धरण स्रोत (यदि आवश्यक): Matthew Henry, Albert Barnes, Adam Clarke के सार्वजनिक-डोमेन टिप्पणियों से संक्षिप्त अवधारणाओं का सम्मिलन रहा है; जहाँ शुद्ध शब्द-उद्धरण उपलब्ध रहे, वहाँ नीचे बताए गए नामों के साथ स्पष्ट संकेत दिए गए हैं।

नोट: उपरोक्त में किसी भी प्रत्यक्ष पूर्ण वाक्य का एकदम उद्धरण केवल उन्हीं टिप्पणियों के भीतर उपलब्ध हो तो वही उद्धृत किया गया है; अन्य विचार समकालीन संकलनों के सामान्य विवेचनाओं से समाहित हैं।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

सभोपदेशक 5:19 समानांतर पद और संबंधित वचन

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किसी मनुष्य को परमेश्‍वर धन सम्पत्ति और प्रतिष्ठा यहाँ तक देता है कि जो कुछ उसका मन चाहता है उसे उसकी कुछ भी घटी नहीं होती, तो भी परमेश्‍वर उसको उसमें से खाने नहीं देता, कोई दूसरा ही उसे खाता है; यह व्यर्थ और भयानक दुःख है।

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व्यवस्थाविवरण 8:18 (HINIRV) »
परन्तु तू अपने परमेश्‍वर यहोवा को स्मरण रखना, क्योंकि वही है जो तुझे सम्पत्ति प्राप्त करने की सामर्थ्य इसलिए देता है, कि जो वाचा उसने तेरे पूर्वजों से शपथ खाकर बाँधी थी उसको पूरा करे, जैसा आज प्रगट है।

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और यह भी परमेश्‍वर का दान है कि मनुष्य खाए-पीए और अपने सब परिश्रम में सुखी रहे।

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