सभोपदेशक 5:10 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

जो रुपये से प्रीति रखता है वह रुपये से तृप्त न होगा; और न जो बहुत धन से प्रीति रखता है, लाभ से यह भी व्यर्थ है।

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सभोपदेशक 5:10 पद-दर-पद बाइबल टीका

सभोपदेशक 5:10 का सार भाव

जो रुपये से प्रीति रखता है वह रुपये से तृप्त न होगा; और न जो बहुत धन से प्रीति रखता है, लाभ से यह भी व्यर्थ है।

संदर्भ और पृष्ठभूमि

नीति-कथा संसार के धन-लोभ को चेतावनी देती है। यहाँ हम देखते हैं कि धन की चाह कितनी बार आत्मिक संतुष्टि को प्रभावित करती है—धन तो 싶은 है परन्तु उसकी प्राप्ति से आत्म-शांति और वास्तविक तृप्ति नहीं मिलती। नम्रता के साथ कहा गया है कि धन-लिप्सा से मिलने वाली खुशी fleeting है; जो अत्यधिक धन की चाह के पीछे भागता है, उसे अंतिमतः शांति नहीं मिलती।

व्याख्यात्मक विचार

- धन से प्रीति रखना एक आंतरिक भूख है जो प्रायः संतुष्टि नहीं देते। यह उसी प्रकार है जैसे चित्त को कभी-न खत्म होने वाली चाह ने घेर लिया हो।

- वास्तव में तृप्ति बाहरी संपत्ति में नहीं, बल्कि हृदय की स्थिरता और परमात्मा के साथ समीपता में होती है।

- यह वचन वस्तुनिष्ठ सत्य बताता है: धन के साथ आनंद की गति बढ़ती नहीं; यदि धन के पीछे भागना है, तो लाभ भी फिर क्षणभंगुर है और आध्यात्मिक लाभ घटते जाते हैं।

सूक्ष्म दृष्टिकोण (संकेतित विचार)

  • धन-लिप्सा संतोष की बाधा बनती है; संतोष परमेश्वर की कृपा से आता है, न कि संपत्ति से।
  • अत्यधिक धन-सम्मत महत्व व्यक्ति के समय-बोध को बदल सकता है, जिससे जीवन की प्राथमिकताएँ विकृत हो जाती हैं।
  • धन का सही उपयोग और ईमानदार साधना दोनों मिलकर आंतरिक शांति को संभव बनाते हैं।

संबद्ध पाद्रव्य उद्धरण (Cross-References)

- अन्यालोकन: कुछ पाठ धन के भंडार से नहीं, बल्कि विवेकपूर्ण नियत से तृप्ति की ओर इशारा करते हैं; यह भिन्न-भिन्न संदर्भों में दिखता है, जैसे कि गरीबी और धन-दौलत की समीक्षा पर विस्तार।

- आत्म-तृप्ति और विश्वासी जीवन के साथ संतोष: धन-लिप्सा से मुक्त होकर परमेश्वर की प्रदान की गई शांति में टिके रहने की आवश्यकता।

नोट: ऊपर के संकेत बाइबल के समान्तर पाठ से प्राप्त सामान्य निष्कर्ष हैं; ये विशिष्ट वाक्यों के पूर्ण टेक्स्ट नहीं दे रहे हैं।

पंक्ति-दृष्टिकोण का संक्षेप (Thematic Snapshot)

  1. धन से अत्यधिक प्रेम शांति नहीं देता; यह瞬เวลา है।
  2. आध्यात्मिक तृप्ति बाहरी संपत्ति पर निर्भर नहीं करती।
  3. धन को सही ढंग से उपयोग करना और ईश्वर-प्रिय जीवन संतोष को बनाये रखता है।

व्यावहारिक निष्कर्ष

यथार्थ संतोष वह है जो परमेश्वर के साथ संबंध में मिला है—धन केवल साधनों के रूप में उपयोग करें, उसकी चाह को भगवान की सेवा से पहले न रखें। धन-लोभ से बचने के लिए संयम और इमानदारी को अपना जीवन-चरित बनायें; इससे अंतःकरण में शांति और स्थिरता प्राप्त होती है।

उद्धृत सूत्र: यदि उपलब्ध हो तो Matthew Henry, Albert Barnes या Adam Clarke के शुद्ध पाठ उद्धरणों की जगह पर हमने संक्षेप रूप में सन्नद्ध टिप्पणी को जोड़ा है; जहाँ उनके शब्द सीधे उद्धृत हैं, वहां आवश्यकत अनुसार संकेत दिए गए हैं।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

सभोपदेशक 5:10 समानांतर पद और संबंधित वचन

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