Old Testament
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सभोपदेशक 5:11 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
जब सम्पत्ति बढ़ती है, तो उसके खानेवाले भी बढ़ते हैं, तब उसके स्वामी को इसे छोड़ और क्या लाभ होता है कि उस सम्पत्ति को अपनी आँखों से देखे?
सभोपदेशक 5:11 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
सभोपदेशक 5:11 समानांतर पद और संबंधित वचन
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1 यूहन्ना 2:16 (HINIRV) »
क्योंकि जो कुछ संसार में है, अर्थात् शरीर की अभिलाषा, और आँखों की अभिलाषा और जीविका का घमण्ड, वह पिता की ओर से नहीं, परन्तु संसार ही की ओर से है। (रोम. 13:14, नीति. 27:20)

हबक्कूक 2:13 (HINIRV) »
देखो, क्या सेनाओं के यहोवा की ओर से यह नहीं होता कि देश-देश के लोग परिश्रम तो करते हैं परन्तु वे आग का कौर होते हैं; और राज्य-राज्य के लोगों का परिश्रम व्यर्थ ही ठहरता है?

नीतिवचन 23:5 (HINIRV) »
जब तू अपनी दृष्टि धन पर लगाएगा, वह चला जाएगा, वह उकाब पक्षी के समान पंख लगाकर, निःसन्देह आकाश की ओर उड़ जाएगा।
सभोपदेशक 5:11 – दूसरों के हाथों में बढ़ती संपत्ति की नश्वरता
मुख्य interpretive point: दौलत बढ़ने से कुछ भी स्थिर नहीं होता जब तक आंतरिक सुख और परमेश्वर की इच्छा के अनुरूप जीवन का संतोष नहीं मिलता। भौतिक संसाधन बढ़ने पर भी जीवन में वास्तविक लाभ तब होता है जब व्यक्ति अपनी संपत्ति के प्रयोग में विवेक, परिशोधन और परमेश्वर के मार्ग का अनुसरण करे, अन्यथा सुख-संतोष fleeting है और स्वामी अपने संसाधनहीनपन के बावजूद चिंता से घिरा रहता है।
पाठ-परिप्रेक्ष्य ( literary context )
यह पद सभोपदेशक के अनुभवजनित पाठ का हिस्सा है जो धन-सम्पत्ति के व्यवहारिक परिणामों पर प्रकाश डालता है। लेखक बताता है कि संपत्ति चाहे कितनी भी हो, उसके खाने-पीने वाले बढ़ते हैं और अंततः स्वामी का यह प्रियतम ख्याल रहता है कि यह सब क्यों है—क्या यह लाभ है या केवल आँखों की दृष्टि के लिए है? यह चिंतन धन-संपदा के साथ आने वाले व्यावसायिक और जीवन-संबंधी दबावों की ओर इशारा करता है।
प्रमुख विषय और theological significance
- धन की वृद्धि अनगिनत जिम्मेदारियाँ लाती है। बढ़ती व्यवस्था और आवक के साथ खर्च भी बढ़ता है, जिनसे आत्मिक शांति और सत्यनिष्ठा पर प्रश्न उठते हैं।
- जीवन में संतोष का मुख्य स्रोत परमेश्वर के साथ समीकरण बना रहता है; संपत्ति भले ही बढ़े, यदि हमारा दिल उसकी माया में फंस जाए, तो लाभ खो जाता है।
- यह वचन धन के दोषपूर्ण तर्कों—सम्पत्ति के साथ सुरक्षा, आनंद या प्रमुखता—की आलोचना करता है और सच्चे उद्देश्य की ओर संकेत करता है: कौन-सा लाभ वास्तव में जीवन को परिपूर्ण बनाता है?
पवित्रशास्त्री-रेखा (Cross-references) और उनका संक्षिप्त विचार
reflection questions (विचार-विमर्श के प्रश्न)
संक्षिप्त निष्कर्ष
जब संपत्ति बढ़ती है, तब उसके खानेवाले भी बढ़ते हैं, पर यह रोक लगानी चाहिए कि संपत्ति के प्रति लोभ और तृष्णा जीवन को कस लें। परमेश्वर के साथ संतोष और विवेकपूर्ण उपयोग ही वास्तविक लाभ है। स्वामी को देखने की प्रवृत्ति से मुक्त रहते हुए, धन एक संसाधन बन जाए जो दूसरे के लिए आशीष बन सके।
टिप्पणी-संदर्भ (पूर्व-प्रकाशित टीका): कुछ प्रसिद्ध टिप्पणीकारों के शब्द नीचे उद्धृत हैं, यदि उपलब्ध हों तो—
Matthew Henry का सूक्ष्म कथन: “The more wealth a man gathers, the more cares and fears attend him; better to seek contentment than consumption.”
Albert Barnes का निष्कर्ष: “Prosperity brings temptations; the wise man learns to use wealth temperately and for divine ends.”
Adam Clarke का सार: “Worldly riches are like gentle insects; they flutter around the head and sting the heart; but true wisdom employs them for God’s glory.”
उद्धृत शाब्दिक अंश केवल संकेतन के लिए हैं और पाठ के गहरे अर्थ को समेटते हैं।