Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीसभोपदेशक 5:18 बाइबल पद की व्याख्या
सभोपदेशक 5:18 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
सुन, जो भली बात मैंने देखी है, वरन् जो उचित है, वह यह कि मनुष्य खाए और पीए और अपने परिश्रम से जो वह धरती पर करता है, अपनी सारी आयु भर जो परमेश्वर ने उसे दी है, सुखी रहे क्योंकि उसका भाग यही है।
सभोपदेशक 5:18 पद-दर-पद बाइबल टीका
*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।
सभोपदेशक 5:18 समानांतर पद और संबंधित वचन
उन बाइबल पदों को देखें जो विषय, शिक्षा या संदर्भ के आधार पर इस अंश से जुड़े हैं। समानांतर पदों की तुलना करने से इस वचन के संदर्भ और संदेश को अधिक गहराई से समझने में सहायता मिलती है। किसी चित्र को चुनें और संबंधित पद, उसकी व्याख्या तथा पद-दर-पद बाइबल टीका देखें।

सभोपदेशक 2:24 (HINIRV) »
मनुष्य के लिये खाने-पीने और परिश्रम करते हुए अपने जीव को सुखी रखने के सिवाय और कुछ भी अच्छा नहीं। मैंने देखा कि यह भी परमेश्वर की ओर से मिलता है।

सभोपदेशक 3:12 (HINIRV) »
मैंने जान लिया है कि मनुष्यों के लिये आनन्द करने और जीवन भर भलाई करने के सिवाए, और कुछ भी अच्छा नहीं;

सभोपदेशक 3:22 (HINIRV) »
अतः मैंने यह देखा कि इससे अधिक कुछ अच्छा नहीं कि मनुष्य अपने कामों में आनन्दित रहे, क्योंकि उसका भाग यही है; कौन उसके पीछे होनेवाली बातों को देखने के लिये उसको लौटा लाएगा*?
सभोपदेशक 5:18 — संदर्भ और अर्थ
यह श्लोक वह संदेश देता है जो पर्यायवाची रूप में जीवन के सरल किए गए अनुभव से जुड़ा है: मनुष्य को चाहिए कि वह छोटे-छोटे सुखों में परमेश्वर द्वारा प्रदत्त अवसरों को देखने और उनका सही इस्तेमाल करने पर ही निरंतर संतुष्टि पाए। लेखक साधारण कृत्यों—खाना, पीना और श्रम से अर्जित आय—को इष्ट मानता है, क्योंकि यही उसका भाग है।
ईश्वर और विश्वास का संकेत
इस आयत में परमेश्वर की कृपा और मानव के दायित्व का संतुलन स्पष्ट है: जीवन के दैनिक सुख और परिश्रम के परिणाम दोनों परमेश्वर की देन हैं। भक्ति केवल ऊँचे प्रस्तावों तक सीमित नहीं रहती; वह इन्हीं सामान्य अवस्थाओं में भी विश्वास और संतुष्टि खोजने की प्रेरणा देती है। यह समूह-स्तरीय आशीर्वाद नहीं, बल्कि प्रायः व्यक्तिगत स्थितियों मेंाह है—जो तब सही चरित्र बनाता है जब मनुष्य अपने भाग्य को ईश्वर के हाथ में छोड़ देता है।
महत्वपूर्ण शब्द और छवि
अन्य संबंधित बाइबिल पाठ
1) गलत संतुष्टि की आलोचना के विरुद्ध: बेरोजगारी या स्वार्थ की बजाय संतुष्टि की प्रकृति को समझना।
2) परमेश्वर की देन के रूप में जीवन के दैनिक सुख: मत्ती के उपदेशों में भी दैनिक आवश्यक्ताओं पर ध्यान देने की शिक्षा है।
3) धैर्य और विश्वास: समय के साथ परमेश्वर के वचन के अनुसार जीवन जीना सीखना।
आज के लिए अनुप्रयोग
- अपनी दैनिक जीवनशैली में साधारण तृप्ति को मान्यता दें: भोजन, पेय और मेहनत से मिले सुखों को आभार के साथ ग्रहण करें।
- परिश्रम के साथ आत्म-स्वीकृति रखें: मेहनत से अर्जित आय को ईश्वर के उद्देश्य के लिए उपयोग में लाने का निश्चय करें।
- समय की सीमा को समझें: हर दिन को ईश्वर की दी हुई एक प्रस्तावना मानकर उसकी सेवा में बिताएं; भाग-भरोसे को पैसा नहीं, चरित्र बनावट पर लगाएं।
मैथ्यू हेनrey, ऐल्बर्ट बार्न्स, एडम क्लार्क की संक्षिप्त दृष्टि
मैथ्यू हेन्री (कथा-व्याख्या) कहते हैं कि प्रेरित करने वाला तत्व यह है कि व्यक्ति अपने दिन-चर्या में परमेश्वर की देन को मानकर संतुष्ट रहे।
ऐल्बर्ट बार्न्स यह दिखाते हैं कि जीवन की छोटी चीजें—खाना, पीना, मेहनत—इन सबमें भी ईश्वर की व्यवस्था है और इन्हीं से व्यक्ति का भाग निर्मित होता है।
एडम क्लार्क इस अनुभाग को मानवीय व्यवहार के लिए एक आचार संहिता मानते हैं: विश्वसनीयता, धैर्य और परिश्रम की कद्र।
एक सुरक्षित cross-reference
यही विचार प्रैक्टिकली जेम्स 4:13-15 के स्वभाव से भी जुड़ता है, जहाँ जीवन के समय-सार को ईश्वर के इरादे के साथ तौलने की बात है; और फिलिप्पियों 4:11-13 में प्रभु की सहायता से संतुष्टि की शिक्षा मिलती है।
इस अध्याय का मूल संदेश यही है: ईश्वर ने हमारे लिए जो कुछ हमारे पास है, उसे एक नैतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से देखना चाहیए—उस पर संतुष्टि और जिम्मेदार प्रयोग की धारा बहती है।