Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीVerse
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इफिसियों 5:5 पर एक विनम्र मार्गदर्शन
यह वचन यह याद कराता है कि मसीही जीवन में व्यवहार और विश्वास्त के ठोस मानदंड होते हैं। प्रेरित पतरस के प्रेरक संदेशों की तरह, नया नियम में पवित्र जीवन की मांग स्पष्ट रहती है: कब क्या उचित है और क्या नहीं। यहां बताया गया पाठ व्यक्त करता है कि परमेश्वर के राज्य में आ जाने के बाद भी, अस्थिर या भटकाव वाले जीवन के कुछ रास्ते अस्वीकृत होते हैं।
आयत का संदर्भ और अध्याय के साथ उसका स्थान
यह आयत इफिसियों पत्र के संकलन में नैतिक जीवन के नये मानदंडों का हिस्सा है। पवित्र शास्त्र में अनेक बार “राज्य” शब्द से परमेश्वर के राज्य-जीवन की ओर संकेत किया गया है, जिसमें ईमानदार श्रद्धा और पवित्र आचरण विशेषता बनते हैं। इस अध्याय में पवित्र जीवन के लिए आवश्यक नम्रता, प्रेम और प्रकाशित सच को विकसित करने की exhortation मिलती है।
मुख्य आध्यात्मिक शिक्षा
अन्य बाइबिल संदर्भों से तुलना
- रोमियों 8:8 में स्पष्ट होता है कि शवों के निम्न आदर्शों के साथ रहने से आत्मा-जीवन अस्थिर रहता है।
- 1 कुरिन्थियों 6:9–10 में भी उन लोगों की सूची मिलती है जिनके साथ परमेश्वर का राज्य नहीं रहता, जो इस आयत के साथ एक संगत चेतावनी साझा करते हैं।
- पौलुस के अन्य उपदेशों में भी धन, लोभ, और मूर्तिपूजा के विरुद्ध सचेत किया गया है, ताकि विश्वासियों की आंतरिक गवाही और बाह्य आचरण समान रहें।
व्यवहार और अनुप्रयोग
जीवन में स्पष्ट दूरी बनाइए: जो चीजें आत्मा को आकर्षित नहीं करतीं, वे परमेश्वर के राज्य में प्रवेश के मार्ग में बाधक बनती हैं। यह आयत प्रोत्साहित करती है कि हम अपने दिल के लक्ष্যমार्ग को पवित्र बनाए रखें—धन के पीछे अति-लिप्तता से दूर रहें, अशुद्ध विचारों और असली चरित्र के साथ न हो सकें।
व्यावहारिक विचार:
संदर्भ-उद्धरण (संशोधन के साथ)
यहाँ मौलिक व्याख्या के भीतर कुछ प्रसिद्ध टिप्पणियाँ संक्षेप में सम्मिलित हैं:
Matthew Henry: “Christians should beware of every corrupting thing; उनके साथ जो भी चीज़ उन्हें मूर्तिपूजा या लोभ की और ले जाए, उसे दूर रखें। उसे வாழते समय ही सत्य का परिणाम मिलता है।”
Albert Barnes: “जो जीवन परमेश्वर के राज्य में प्रवेश नहीं करेगा, उसका राज्य-हक़ नहीं मिलता; यह लोभ, अशुद्धता और व्यभिचार से भी जुड़ा है।”
Adam Clarke: “यह आयत स्पष्ट करती है कि ईमानदार जीवन और पवित्रता परमेश्वर के मार्ग में अनिवार्य हैं; नहीं तो राज्य हमारा नहीं।”
क्रॉस-रेफरेंसेस
1) रोमियों 6:12–13 — पाप के अधिकार से शरीर को निष्क्रिय रखने और आत्मा के मार्ग पर चलने की प्रेरणा।
2) 1 कुरिन्थियों 6:9–10 — वही चेतावनी कि कुछ पापी जीवन-शैली परमेश्वर के राज्य में विरासत नहीं दे सकती।
3) कुलुस्स 3:5 — पृथ्वी-के लोभों को भस्म करने की वाणी और पवित्र जीवन को अपनाने के लिए एक मार्गदर्शक।
संक्षिप्त सार
यह आयत स्पष्ट करती है कि मसीह के अनुयायियों के लिए विरासत का मार्ग पवित्रता और ईमानदारी से निकलता है। लोभ, अशुद्धि या मूर्तिपूजा जैसे व्यभिचारपूर्ण मार्ग परमेश्वर के राज्य के उद्देश्य से टकराते हैं—इसलिए इन मान्यताओं से दूरी बना कर ही हम अपनी सच्ची पहचान और भागीदारी को बनाए रख सकते हैं।
कथन के अनुसार पवित्रता के लिए एक समन्वित जीवन चाहिए—आत्मा की प्रेरणा से, व्यवहार में ईमानदारी और प्रेम का प्रभाव दिखे।