Old Testament
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इफिसियों 5:27 पर टिप्पणी
पवित्रता की यह प्रेरणा पूरी तरह यीशु मसीह के विवाह-प्रकट से जुड़ी है। पवित्र आत्मा के द्वारा विश्वासियों को तैयार कर के ईश्वरीय आत्मीय समुदाय के लिए एक सुंदर, कलंक-रहित कलीसिया के रूप में प्रस्तुत किया जाना लक्ष्य है। इस वाक्य में परमेश्वर का उद्देश्य है कि वह अपनी धर्मसभा को उसी पवित्रता में देखना चाहता है जो उसके अनुयायियों के दिलों में बदलाव से उत्पन्न होती है।
मुख्य अर्थ
यह वाक्य ईफिसियों के पहले भाग के अंतर्गत, चर्च के रिश्ते-आधार और मसीह के प्रेम के प्रतीक के रूप में प्रस्तुत किया गया है। यीशु मसीह ने अपनी कलीसिया के लिए स्वयं को समर्पित किया ताकि वह उसे मुक्त, पवित्र और निर्दोष बनाए। यह पवित्रता बाहरी व्यवस्था से अधिक आन्तरिक परिवर्तन—दिल में विश्वास, बपतिस्मा के फल और आचरण‑परिवर्तन—पर निर्भर है।
दो-तीन मुख्य विषय
संश्लेषित विचार (Cross-references के साथ)
प्रत्येक संदर्भ में नोट करें कि पवित्रता केवल नैतिक नियंत्रण नहीं, बल्कि परमेश्वर के साथ नज़दीकी रिश्ते और विश्वास की गहराई का परिणाम है।
व्यावहारिक विचार
कथन-समापन
ईफिसियों 5:27 में परमेश्वर की इच्छा स्पष्ट है: उसकी तेजस्वी कलीसिया ऐसी हो जिसमें न कलंक हो, न झुर्री, बल्कि पवित्र और निर्दोष हो। यह लक्ष्य यीशु मसीह के प्रेम और आत्मा के कार्य द्वारा ही संभव है। विश्वासियों का जीवन, समुदाय, और आस्था-जीवन एक निरंतर पवित्र परिवर्तन के केंद्र में है।
पूर्व-उद्धरण संकेत
ऐतिहासिक अभिलेखों के अनुसार, Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के कुछ समान विचार इन बिंदुओं के साथ संगत हैं: वे यह दर्शाते हैं कि कलीसिया का पवित्रता-लक्ष्य यीशु के प्रेम-उद्धार और आत्मीय परिवर्तन पर आधारित है। Hindi पाठ के लिए संक्षेप सार इन विचारों के समेकन के रूप में प्रस्तुत किया गया है।