Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
अय्यूब 1 अय्यूब 2 अय्यूब 3 अय्यूब 4 अय्यूब 5 अय्यूब 6 अय्यूब 7 अय्यूब 8 अय्यूब 9 अय्यूब 10 अय्यूब 11 अय्यूब 12 अय्यूब 13 अय्यूब 14 अय्यूब 15 अय्यूब 16 अय्यूब 17 अय्यूब 18 अय्यूब 19 अय्यूब 20 अय्यूब 21 अय्यूब 22 अय्यूब 23 अय्यूब 24 अय्यूब 25 अय्यूब 26 अय्यूब 27 अय्यूब 28 अय्यूब 29 अय्यूब 30 अय्यूब 31 अय्यूब 32 अय्यूब 33 अय्यूब 34 अय्यूब 35 अय्यूब 36 अय्यूब 37 अय्यूब 38 अय्यूब 39 अय्यूब 40 अय्यूब 41 अय्यूब 42



अय्यूब 11:7 का सीधा अर्थ
इस पद के अनुसार परमेश्वर के रहस्य को मनुष्यों की कल्पना से परे माना जाना चाहिए। वह गूढ़ भेद को समझाने की सीमा तक नहीं पहुंच सकता; और जो सर्वशक्तिमान है, उसकी गहराई और मर्म का पूर्ण परीक्षण भी हमारी सीमा से बाहर है।
पृष्ठभूमि जो इस पाठ को समझाती है
नीलयकथा में इरतेस्तक (जब्त/बुलंदी) के समय आय्यूब के मित्रों ने उसकी पीड़ा के कारण किसी कारण-निर्णय की जाँच करने की कोशिश की। इसी प्रसंग में मित्रों के द्वारा उकेरे गए तर्कों के विरुद्ध האלस्थ (Adel) एक आवाज उठती है जो परमेश्वर की महानता और मनुष्य की तुच्छता को दिखाती है। यह पद उस शिक्षा का हिस्सा है कि परमेश्वर के मार्ग अज्ञात रहते हैं, और उसकी योजना सभी परिस्थितियों के पार है।
व्याख्यात्मक प्रमुख बिंदु
अन्वय और विचार-विन्यास
यह उद्धबोधन आय्यूब के ज्ञान-आकांक्षा के क्षितिज को स्पष्ट करता है—हम कभी भी परमेश्वर की पूर्ण योजना को पूरी तरह समझ नहीं पाते। इसलिए हमें अपने तर्कपूर्ण ताने-बाने को दरकिनार कर उसकी अधिकार-सीमा को स्वीकारना चाहिए।
संवेदनशील क्रॉस-रेफेरेंस
- निर्गमन 33:19-23: परमेश्वर की इच्छा और मार्ग का स्पष्ट संबन्ध—क्योंकि उसका प्रत्यक्ष दर्शन हमारे लिए अत्यंत मर्यादित है।
- प्रकाशित पैगंबर 3:11: परमेश्वर की योजनाओं के प्रकाश में मनुष्य का निरीह कवच घटते नहीं, पर उसकी करुणा आगे बढ़ती है।
- रुब्र 11:6: विश्वास के साथ परमेश्वर पर निर्भरता से उसकी पूर्णता प्रकट होती है।
संक्षिप्त व्यवहारिक निष्कर्ष
1) कठिन समय में भी परमेश्वर की सोई-नीतियों पर विश्वास रखें; 2) अपने तर्क को सीमित रखें ताकि आत्म-गौरव न बढ़े; 3) विनम्रता के साथ परमेश्वर की महानता की सराहना करें।
संगत टिप्पणी
पश्चात्ताप और अन्वेषण के समय कई पुराने तर्क असल में मानव-समझ की सीमा को उजागर करते हैं। यह पाठ हमें याद दिलाता है कि परमेश्वर के निर्णयों की गहराई तक पहुँचना हम पर निर्भर नहीं है; हमने केवल विश्वास और नम्रता के साथ उनके मार्ग को स्वीकार करना चाहिए।
पूर्ववर्ती पंक्तियों से साहचर्य
मथ्यू हेनरी (Matthew Henry): परमेश्वर के विचार हमारी समझ से ऊपर रहते हैं; इसलिए वैचारिक तर्कपूर्ण निष्कर्षों के साथ भी मनुष्य को विनम्र रहना चाहिए।
अल्बर्ट बार्न्स (Albert Barnes): परमेश्वर की कार्य-योजना अज्ञात हो सकती है, परन्तु उसकी नीयत सदैव भलाई तक पहुँचती है—यह विश्वसनीयता है।
एडम क्लार्क (Adam Clarke): हमारे संसर्ग में सारे प्रश्न समाप्त नहीं होते; परन्तु विश्वास उसी क्षण भी स्थिर रहता है जब हम याद करें कि परमेश्वर की शक्ति अत्यधिक और उसके मार्ग गहरे हैं।
कथन-सार
इस पद का मूल संदेश है—परमेश्वर के विचार और मार्ग हमारे विवेक से परे हो सकते हैं; इसलिए हमें धैर्य, विनम्रता और विश्वास के साथ उनका सम्मान करना चाहिए।