Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
अय्यूब 1 अय्यूब 2 अय्यूब 3 अय्यूब 4 अय्यूब 5 अय्यूब 6 अय्यूब 7 अय्यूब 8 अय्यूब 9 अय्यूब 10 अय्यूब 11 अय्यूब 12 अय्यूब 13 अय्यूब 14 अय्यूब 15 अय्यूब 16 अय्यूब 17 अय्यूब 18 अय्यूब 19 अय्यूब 20 अय्यूब 21 अय्यूब 22 अय्यूब 23 अय्यूब 24 अय्यूब 25 अय्यूब 26 अय्यूब 27 अय्यूब 28 अय्यूब 29 अय्यूब 30 अय्यूब 31 अय्यूब 32 अय्यूब 33 अय्यूब 34 अय्यूब 35 अय्यूब 36 अय्यूब 37 अय्यूब 38 अय्यूब 39 अय्यूब 40 अय्यूब 41 अय्यूब 42



अय्यूब 17:2 पर टिप्पणी — उस संदर्भ में मेरा क्या भाग है?
यह शाब्दिक पंक्ति उन व्यक्तियों के प्रति अय्यूब की निराशा और एक प्रकार की न्यायपूर्ण शिकायत को दर्शाती है: वे लोग जो मेरे साथ हैं, वे मज़ाक उड़ाने वाले हैं और उनके झगड़े-रगड़े की ध्वनि मुझे तब भी सुनाई देती है जब अय्यूब अपने दुखों के बीच अकेला पड़ रहा है। यह वचन एक गहरी मानवीय अनुभूति को उद्घाटित करता है—क्यों सीखा जाए कि पीड़ा के समय अक्सर चारों तरफ से विरोध, अस्पष्टताओं और तानों से भी सामना करना पड़ता है।
पार्श्वभूमि और मूल संदर्भ
अय्यूब की किताब एक दार्शनिक-धर्मात्मा की आर्त पुकार है जिसमें वह अपने दुखों के कारण और परमेश्वर के न्याय के बारे में भयावह प्रश्न रखता है। इस छंद में अय्यूब अपने साथियों की प्रतिक्रिया की बात कर रहा है—वे लोग जो सबसे करीबी समझे जाते थे—परन्तु उनकी उपहासपूर्ण टिप्पणियाँ और सवालन वेदना को और बढ़ाती हैं। इस संदर्भ में, मित्रों की मुस्कान और ताने, अय्यूब के अन्दर भविष्यवाणी और विश्वास के बीच एक द्वंद्व बनाते हैं।
मुख्य संदेश
यह शास्त्रीय पाठ एक ऐसी स्थिति को दर्शाता है जिसमें पीड़ित व्यक्ति को लगता है कि उसका आघात और असमानता किसी संवेदना या धर्मिक नैतिकता से कम नहीं है। परन्तु विश्वास के दृष्टिकोण से, यह भी स्मरण कराता है कि दुष्ट ताने-दुराग्रह संसार में सामान्य हैं, पर परमेश्वर के न्याय के दिन वे जवाबदेह होंगे। अय्यूब यहाँ यह संकेत दे रहा है कि उसकी सत्य-खोज और उसके विश्वास की शुद्धता पर ही उसकी आशा टिकी है, भले ही उसके साथियों की धारणा उसके विरुद्ध हो।
थीम्स जो मुख्य रूप से जुड़ते हैं
महत्वपूर्ण क्रॉस-रेफरेंसे
इन सन्दर्भों से आप उसे समझ सकते हैं कि पीड़ा के समय लोग किस प्रकार व्यवहार करते हैं और सत्य के साथ कैसे सामंजस्य बनता है:
इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि पीड़ा के बीच भी व्यक्ति के पक्ष में विश्वास के धागे बनते हैं और परमेश्वर की योजना में धैर्य की महत्ता रहती है।
पाद टिप्पणी—चारित्रिक और देवमूलक धारणाएं
यह श्लोक, दूसरे अध्यायों के मित्रों की भूमिका के आलोक में, यह बताता है कि किस प्रकार भय और विश्वास आरे-आरे से एक साथ चलते हैं। अय्यूब की निराशा में भी ईश्वर की सत्ता और न्याय को ढूंढ़ने की लालसा स्पष्ट है।
व्यावहारिक देवotional अनुभूति
जब जीवन कठिनाई की परतें काट देता है, तब भी हार मानना आध्यात्मिक विकल्प नहीं बनता। इस श्लोक को पढ़कर आप संकेत पाते हैं कि पीड़ा के क्षण में सत्य-आस्था और निष्ठा कैसे रहने चाहिए—अपने दुख के बावजूद ईश्वर को स्मरण करें, और अपने विरोधियों के शब्दों के बजाय परमेश्वर की कृपा पर ध्यान दें।
संकेतित क्रॉस-रेफरेंसे—संक्षेपित वक्तव्य
अन्यत्र उद्धृत शास्त्रों के साथ, आप यह देखेंगे कि पीड़ा के समय निष्कलंक विश्वास और ईश्वर के न्याय का प्रश्न कैसे उठता है, और कैसे परमेश्वर के कैम्प में आशा रहती है।
याद रखें: मित्रों के ताने भले ही असह्य लगें, पर परमेश्वर की सत्यता और अपने आंतरिक विश्वास पर टिके रहना ही सबसे बड़ी विजय है।
ध्यान दें: इस टिप्पणी में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के स्थापित विचारों के संक्षिप्त, सीधे उद्धरण नहीं दिए गए हैं ताकि मूल पाठ्य की निर्भरता बनी रहे; यदि आप चाहें तो मैं उनके प्रकाशित विचारों से संक्षिप्त, आपकी साइट के मुताबिक अनुकूलित उद्धरण जोड़ सकता/सकती हूँ।