Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
अय्यूब 1 अय्यूब 2 अय्यूब 3 अय्यूब 4 अय्यूब 5 अय्यूब 6 अय्यूब 7 अय्यूब 8 अय्यूब 9 अय्यूब 10 अय्यूब 11 अय्यूब 12 अय्यूब 13 अय्यूब 14 अय्यूब 15 अय्यूब 16 अय्यूब 17 अय्यूब 18 अय्यूब 19 अय्यूब 20 अय्यूब 21 अय्यूब 22 अय्यूब 23 अय्यूब 24 अय्यूब 25 अय्यूब 26 अय्यूब 27 अय्यूब 28 अय्यूब 29 अय्यूब 30 अय्यूब 31 अय्यूब 32 अय्यूब 33 अय्यूब 34 अय्यूब 35 अय्यूब 36 अय्यूब 37 अय्यूब 38 अय्यूब 39 अय्यूब 40 अय्यूब 41 अय्यूब 42



अय्यूब 35:15 — इस वक्त के पाठ का महत्व
यह पदENCIL न केवल एक दृश्य शिक्षा देता है कि परमेश्वर के न्याय के समय में भी धैर्य और करुणा की आवश्यकता रहती है, बल्कि यह यह भी समझाता है कि दण्ड और अभिमान के बीच एक विनीत और भरोसेमंद रास्ता कैसे बनता है। अय्यूब की कथा में फिर भी परमेश्वर का उपायोचित क्रम दिखता है—कठिनाईयों के बीच भी उद्धार की संभावना बनी रहती है। यह वाक्य हमें याद दिलाता है कि ईश्वर के समय पर विश्वास रखना चाहिए, जब तक वह स्पष्ट रूप से बोलता नहीं है तब तक उत्तर की प्रतीक्षा करनी चाहिए।
पारिपाटिक संदर्भ और मूल संवेदना
अय्यूब 35 अध्याय में एलिपोटिक शिक्षण दिया गया है कि जहां मानवीय प्रदर्शन और दंड के नियम अक्सर भ्रमित करते हैं, वहाँ परमेश्वर की न्यायिकता और दयालुता का संतुलन बना रहता है। शब्द “अभी तो उसने क्रोध करके दण्ड नहीं दिया है” से दिखता है कि परमेश्वर अभी भी धैर्य रख रहा है, ताकि मनुष्य अपने शब्दों and actions से सचेत होकर लौटे। अभिमान पर चित्त का न लगना बताता है कि ईश्वर को समय चाहिए ताकि व्यक्ति अपने अहंकार को पहचान सके और उसकी सच्ची दशा को समझ सके।
मुख्य संदेश
इस verse का केंद्र विचार है कि क्रोध का तुरंत परिणाम हर समय नहीं दिखता, बल्कि प्रभु की patiently waits और correction का अवसर रहता है। परमेश्वर की करुणा और न्याय एक साथ चलते हैं—उसी कारण से व्यक्ति को अपने स्वभाव से पुनः परिभाषित होने का मौका मिलता है। अभिमान और दण्ड के बीच मानव को ईश्वरीय दयालुता के साथ विवेक से चलना चाहिए, ताकि न फलस्वरूप आत्म-परित्याग हो और न अज्ञानता से गलत व्यवहार ही दोहराए जाएँ।
धरोहर विचार: सत्ता, धैर्य और उद्धार
नालीदार विचार में यह दिखता है कि परमेश्वर उनकी रचना के प्रति धैर्यपूर्वक काम कर रहे हैं। समान प्रकार के कथा-उद्धरणों में धैर्य की आवश्यकता और प्रभु की कृपा पर भरोसा दिखता है। यह पाठ आत्म-नियंत्रण, विनम्रता और ईश्वर के समय पर निर्भरता पर बल देता है।
क्रॉस-रेफरेंस (संक्षेप में) और उनकी संक्षिप्त व्याख्या
संकेतित संदर्भों का छोटा विवेचन यह है कि पूण्य समय-सीमा में परमेश्वर के क्रोध की धार एक साथ नहीं है; प्रेम और न्याय की रस्सी में संतुलन बना रहता है, जिससे पापी को सचेत होने और सुधार के मार्ग पर चलने का अवसर मिल सके।
देवotional reflection
आज हम भी इस verse के आदर्शों को अपने जीवन में लागू करें: जब हमारे साथ कठिनाई आये, तब धैर्य रखें, अपने अभिमान को पहचानें और परमेश्वर के समय पर भरोसा रखें। ईश्वर की कृपा से ही हम सत्य और विनम्रता के मार्ग पर टिकते हैं, ताकि उसकी महिमा बढ़े और हमारी आत्मा पुनः स्थापित हो।