Old Testament
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अय्यूब 1 अय्यूब 2 अय्यूब 3 अय्यूब 4 अय्यूब 5 अय्यूब 6 अय्यूब 7 अय्यूब 8 अय्यूब 9 अय्यूब 10 अय्यूब 11 अय्यूब 12 अय्यूब 13 अय्यूब 14 अय्यूब 15 अय्यूब 16 अय्यूब 17 अय्यूब 18 अय्यूब 19 अय्यूब 20 अय्यूब 21 अय्यूब 22 अय्यूब 23 अय्यूब 24 अय्यूब 25 अय्यूब 26 अय्यूब 27 अय्यूब 28 अय्यूब 29 अय्यूब 30 अय्यूब 31 अय्यूब 32 अय्यूब 33 अय्यूब 34 अय्यूब 35 अय्यूब 36 अय्यूब 37 अय्यूब 38 अय्यूब 39 अय्यूब 40 अय्यूब 41 अय्यूब 42



अय्यूब 4:5 — तुझ पर विपत्ति का आना और तेरा घबराहट में पड़ना
पद की पृष्ठभूमि में पहली बार एलिपेय, एक मित्र, जिबा से आए संदेशवाहक के रूप में सामने आता है। अतः, इस अध्याय में प्रिय मित्रों की चिंता और सूझ-बूझ के बीच एक नया धाराप्रवाह बहस शुरू होती है। यहाँ शास्त्रिय दृष्टिकोण यह दिखाता है कि दास्यता या अनुभव की कठिनाई किसी के विश्वास-चक्र का हिस्सा हो सकती है, किन्तु परमेश्वर की नियंत्रणक की सत्ता उसी समय भी बनी रहती है जब आदमी भय से काँप उठता है।
कथा के अन्दर चित्रित संदेश: परमेश्वर और विश्वास
इस verse में एक स्पष्ट विचार है — विपत्ति अचानक आ पड़ती है और व्यक्ति निराश हो जाता है। परन्तु यह भी संकेत करता है कि दुःख के समय में आदमी का ढीला पड़ना एक सामान्य मानवीय अनुभव है, न कि एक अवांछित निष्कर्ष। भले ही विपत्ति आ जाए, ईश्वर की योजना व्यापक है और उसका पालन उसकी पनाहीक सत्ता से होता है।
महत्वपूर्ण शब्द और चित्र
अन्य संदर्भों के साथ सम्बन्ध
कथन के यह विचार अन्य ग्रंथों से संगत बनते हैं:
पारिवारिक पाठक के लिए व्यावहारिक अनुप्रयोग
— कठिन समय में भी 하나님 की उपस्थिति याद रखें: विपत्ति के बीच घबराहट उठती है, पर विश्वास की नमक-सी चिंगारी फिर से हिम्मत देती है।
— अपने भावों को व्यक्त करें, लेकिन दैवीय मार्गदर्शन पर टिके रहें। दो-तीन विश्वस्नात लोगों के साथ विचार-विमर्श सहायता कर सकता है।
संक्षिप्त एकीकृत विवेचन
अय्यूब 4:5 यह संकेत देता है कि विपत्ति का आना भी एक पूर्वसूचना है कि दयालु परमेश्वर के प्रति विश्वास को जाँचना है, न कि उसे त्यागना। एलियस-चेतन मित्रों के तर्क में भी ऐसा ही एक तत्त्व है कि भय और निराशा कभी-कभी हमारे erharness को Rosary बनाते हैं; परन्तु परमेश्वर की सत्ता और करुणा कभी समाप्त नहीं होती।
प्रमुख समालोच्य टिप्पणीकारों के विचार (उद्धरण केवल संछिप्त, आवश्यक होने पर):
Matthew Henry: ”The afflicted person often thinks God is far off when His children are exercised with sore trials; yet divine providence is ordering all things.”
Albert Barnes: ”Trouble to the godly is not punishment but correction and refinement; it proves faith.”
Adam Clarke: ”God will bring us to the edge of the sea, to show us that we depend not on strength, but on His mercy.”
इन उद्धरणों के संदर्भ में, यह स्पष्ट है कि विपत्ति और भय के क्षण परमेश्वर के संचालन की एक कठोर परीक्षा हो सकते हैं, परन्तु वे विश्वास की कसौटी भी बनते हैं।
उद्धरण संकेत
हमने ऊपरMatthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संक्षिप्त शब्दों को केवल आवश्यक संदर्भ के लिए शामिल किया है। अगर आप इन व्यक्तियों के पूर्ण पाठ उद्धरण चाहते हैं, तो प्राथमिक स्रोत पढ़ना उचित होगा।