अय्यूब 35:13 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

निश्चय परमेश्‍वर व्यर्थ बातें कभी नहीं सुनता*, और न सर्वशक्तिमान उन पर चित्त लगाता है।

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अय्यूब 35:13 पद-दर-पद बाइबल टीका

अय्यूब 35:13 — पाठ का तात्पर्य और ईश्वर की दृष्टि

यह पंक्तियाँ अय्यूब की गूढ़ शिकायतों के बीच आता है, जब मित्रों के वचनों के अत्यधिक ताने-बाने में जीवन की व्यथा उसे ध्वस्त कर देती है। इसजीवित प्रसंग में नैतिकता और न्याय के प्रश्न उठते हैं: परमेश्वर कहाँ हैं, और वे क्यों चुप रहते हैं? यहाँ भेद यह है कि परमेश्वर बेईमानी, कठिनाइयों या सच्चे आंसुओं को अनदेखा नहीं करते; वह हर बात को गिनते, सुनते और परिणाम तक पहुँचाते हैं। इस आयत में स्पष्ट है कि परमेश्वर व्यर्थ बातों को सुनते नहीं, न ही अत्यंत उदासीन रहते हैं।

क्या कहता है यह पाठ

यह शाब्दिक रूप से कहता है कि “निश्चय परमेश्वर व्यर्थ बातें कभी नहीं सुनता, और न सर्वशक्तिमान उन पर चित्त लगाता है।” यहाँ God की स्वभाविक लक्ष्मी: हर प्रार्थना, हर आर्तना और हर सत्य के संकेत पर उसकी दृष्टि है; पर उसकी सुनवाई की गुणवत्ता और समय कभी-कभी हमारे मानव तात्कालिकता के अनुरोधों से परे हो सकती है। यह वाक्य आस्था को यह सिखाता है कि शिकायत के साथ भी, परमेश्वर की निष्ठा पर प्रश्न उठाने से पहले हमें अपनी ज़रूरतों को उसकी महिमा के अनुसार व्यवस्थित करना चाहिए।

गहरे अर्थ की शब्द-विक्रिया

  • व्यर्थ बातें— ऐसी बातें जो मनुष्य की गतिशीलता, स्वार्थ या शून्यता से भरी हों; परमेश्वर इन्हें महत्व नहीं देते जब वे सत्य और प्रेम से प्रेरित न हों।
  • चित्त लगाना— यहाँ अनुसंधान का अर्थ है गहन विचार, धारणाओं, और निर्णयों में पूर्ण संलग्न होना; परमेश्वर उन चीज़ों पर अपना ध्यान दें, जिनमें सत्य और न्याय का प्रचार है।

संबद्ध बाइबल संदर्भ

परमेश्वर की सुनवाई और न्याय की नीति पर विचार करने के लिए ये संदर्भ सहायक हैं:

  • पदों में समकक्ष विचार: "यहोवा विज्ञान की तरह है"— यह दर्शाता है कि परमेश्वर सत्य को देखता है और उसे उचित रूप में कार्य में लाता है; यह अय्यूब के अनुभव के साथ संगत है कि न्यायलय समय-सीमा से बाहर नहीं होता।
  • अन्य साक्ष्य: प्रलोभन और प्रश्नों के बावजूद ईश्वर की ध्यान देने की नीति—यह समझ में आता है कि कठिन समय में भी प्रभु अपने लोगों की पुकार सुनते हैं, भले ही उसका उत्तर हमें तुरंत न मिले।
  • आश्वासन: परमेश्वर की महिमा और न्याय का उद्देश्य मानव इतिहास में सत्य और परामर्श को स्थापित करना है।

पवित्र लेखन से निकट संबंध

इनपुट विचारों के साथ नीचे दिए गये ग्रंथों से कुछ संकेत मिलते हैं:

  • कुछ अन्य आयतें जो परमेश्वर के न्यायपूर्ण और ध्यानकारी स्वभाव को दर्शाती हैं (उद्धरण नहीं): जब दर्द गहराता है, वह अपने लोगों की सहायता के लिए नज़दीक रहता है।
  • आत्म-समर्थन बनाम अंधविश्वास: पवित्र संदेश यह दिखाता है कि आस्था का टिकाऊ आधार प्रभु की क्रियाओं और वचनों में है, न कि केवल मनुष्यों के तर्कों में।

आज के युग में व्यवहारिक आवेदन

1) कठिनाइयों के बीच भी दृढ़ विश्वास बनाए रखें: भगवान व्यर्थ चीज़ों को नहीं सुनते, पर वह आपके आर्तन को नहीं भूलते। अगर उत्तर तुरंत न मिले, तो उसे अपने जीवन के उद्देश्य और परमेश्वर की महिमा के दायरे में देखना चाहिए।

2) ईमानदार प्रार्थना: अपने दर्द और प्रश्नों को उसके सामने स्पष्ट रखें, पर आग्रह करें कि प्रभु की इच्छा पूरी हो।

3) साथी विश्वासियों से सहायता लें: धैर्य और आशा के लिए समुदाय का सहारा पथप्रदर्शक हो सकता है।

Matthews Henry, Barnes, Clarke—संक्षिप्त सार

यह अनुभाग उनके विचारों को संयोजित करते हुए कहता है कि परमेश्वर की निष्ठा स्थिर है और वह असत्य को नहीं सुनता; और वह कृपा-नियम से कार्य करते हैं, कभी-कभी हमारे समय-सारिणी के अनुसार नहीं।

कृतज्ञ उद्धरण (यदि उपलब्ध):

Matthew Henry और Adam Clarke के मौलिक टिप्पणी-रेखाओं में ऐसे भाव मिलते हैं जो यह दर्शाते हैं कि परमेश्वर हर परिस्थिति में न्याय और करुणा का समन्वय करते हैं; उनके खुले शब्दों के छोटे भाग सीधे उद्धृत नहीं किए जा रहे हैं, पर उनकी प्रेरणा इस विचार-रेखा में प्रतिबिंबित है।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

अय्यूब 35:13 समानांतर पद और संबंधित वचन

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