यिर्मयाह 11:11 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका

इसलिए यहोवा यह कहता है, देख, मैं इन पर ऐसी विपत्ति डालने पर हूँ जिससे ये बच न सकेंगे; और चाहे ये मेरी दुहाई दें तो भी मैं इनकी न सुनूँगा।

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यिर्मयाह 11:11 पद-दर-पद बाइबल टीका

यिर्मयाह 11:11 का अर्थ

इस वचन का मूल अर्थ है: यहोवा कहता है कि उन लोगों पर मैं कड़ा दंड दूँगा जिन्हें वेदना में डालकर सीख लेना चाहिए था, परंतु वे नहीं सुधरे; वे मेरी सहायता की पुकार भी नहीं सुनेंगे। इसका संकेत है कि परमेश्वर के धैर्य की सीमा तक भी मानव अवहेलना जब बढ़ती है, तब विनाशकारी परिणाम सामने आते हैं।

संदर्भिक पृष्ठभूमि

यिर्मयाह के संदर्भ में इब्रानी जाति का चरित्र बार-बार अस्थिर पाते हैं—आस्थाओं में दुवैधता, धार्मिक दिखावे और सामाजिक असंतोष। नबी यिर्मयाह को राज्य-धर्म, असत्य-उपासना और अन्याय के विरुद्ध बार-बार सचेत किया गया; परन्तु अकल और दिल से उनका उत्तर नहीं मिलता, तो परमेश्वर चेतावनी स्वरूप ऐसे उपाय करता है जो अंततः पाप की परिणामस्वरूप आते हैं। इस विशेषVerse में परमेश्वर यह कह रहे हैं कि यदि वे पुनः न सचें, न रुकें, तो विपत्ति तेज होगी और उनकी दुहाई सुनने से मैं रक्षा नहीं करूँगा।

व्याख्या के प्रमुख निष्कर्ष

  • गंभीर चेतावनी: यहोवा उन पर सीधी और कठोर दया-हीनता का परिणाम दिखाते हैं—जिनके पाप दोहराते रहने से उनके लिए सुरक्षा नहीं रहती।
  • स्वतंत्र विकल्प की सीमा: लोग जब तक अपने पाप से सचेत नहीं होते, तब तक बंधन और दण्ड के रास्ते खुलते रहते हैं।
  • आशीष बनाम क्रोध: यह वचन यह भी संकेत देता है कि परमेश्वर के आशीर्वाद को खोना तब होता है जब हमारा मन कठोर रहता है; उसकी सुनवाई तब तक संभव नहीं जब तक परिवर्तन नहीं आता।

थीमैटिक सार (संक्षिप्त)

  1. पाप की निरन्तरता का परिणाम: पुनरावृत्ति से विपत्ति के कड़े कदम बढ़ते हैं।
  2. प्रतिरोध बनाम राहत: दया तब मिलती है जब अंतःकरण बदले और वक्तव्यों के अनुरूप आचरण बदले।
  3. सावधानता और प्रत्याशा: भविष्य में न्याय के साथ वही निष्कर्ष हो सकता है जो परमेश्वर द्वारा निर्धारित है।

अन्य आयतों से संबद्ध संबंध

1) यिर्मयाह 7:26–28 में परमेश्वर का दर्द है कि उन्होंने सुना नहीं; 2) यिर्मयाह 26:11-12 जहाँ नबी यह कहता है कि मंत्रीगण और प्रदेशदर्शी लोग उसे मार डालेंगे, परन्तु परमेश्वर आगे की योजना दिखाते हैं। 3) हेब 10:31 बताता है कि जिससे जीवित ईमान से दूर हो जाते हैं, उसके लिए डरावना आश्रय है।

इन संदर्भों से स्पष्ट होता है कि परमेश्वर की नीतियाँ मानने पर ही जीवन का सुरक्षित मार्ग है; इन आयतों में पाप के परिणाम स्पष्ट हैं और दया-प्रेरित परिवर्तन आवश्यक है।

व्यावहारिक takeaway

  • अपनी आस्थाओं को केवल दिखावे तक सीमित न रखें; निष्ठा और विनम्रता से परमेश्वर के मार्ग पर चलें।
  • पाप-जालों से बचना, दया और न्याय के बीच संतुलन बनाए रखना और प्रतिदिन ईमानदारी से परमेश्वर से प्रार्थना करना जरूरी है।
  • यदि नुकसान-फैसलों के बीच भी दिल को बदलना संभव हो, तो परमेश्वर की ओर लौटना चाहिए; वह सुनने और क्षमा करने को तैयार रहते हैं।

पढ़े जाने योग्य क्रॉस-रेफरेंसेस

यिर्मयाह 7:26–28 — सुना नहीं जाने की निराशा; यह भविष्य के दंड की दिशा में संकेत देता है।

यिर्मयाह 26:11 — नबी की जान पर खतरा, परन्तु परमेश्वर की योजना आगे बढ़ती है।

हेब्रू 10:31 — डरावना निर्गम, जब निश्चय नहीं होता कि परवरदिगार के verdict से बचना है।

नोट: ऊपर के किए गए उद्धरण Matthew Henry, Albert Barnes, और Adam Clarke के किसी भी स्पष्ट उद्धरण नहीं हैं; आवश्यक होने पर उनके विचारों से प्रेरित सार तत्वों को रूपक रूप में शामिल किया गया है ताकि पाठक को सीधे पाठ का अर्थ समझ में आये।

*** इस टीका में सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध कुछ प्राचीन और क्लासिक स्रोतों की सामग्री शामिल है। कुछ सामग्री को कृत्रिम बुद्धिमत्ता उपकरणों की सहायता से संसाधित, संक्षिप्त या अनुवादित किया गया हो सकता है। हर व्याख्या को बाइबल के पूरे पाठ और उसके संदर्भ के साथ अवश्य जाँचें। यदि आपको कोई त्रुटि या ऐसा अनुवाद मिले जिसे सुधारने की आवश्यकता हो, तो कृपया हमसे संपर्क करें।

यिर्मयाह 11:11 समानांतर पद और संबंधित वचन

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यशायाह 1:15 (HINIRV) »
जब तुम मेरी ओर हाथ फैलाओ, तब मैं तुम से मुख फेर लूँगा; तुम कितनी ही प्रार्थना क्यों न करो, तो भी मैं तुम्हारी न सुनूँगा; क्योंकि तुम्हारे हाथ खून से भरे हैं। (नीति. 1:28, मीका. 3:4)

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यहेजकेल 8:18 (HINIRV) »
इसलिए मैं भी जलजलाहट के साथ काम करूँगा, न मैं दया करूँगा और न मैं कोमलता करूँगा; और चाहे वे मेरे कानों में ऊँचे शब्द से पुकारें, तो भी मैं उनकी बात न सुनूँगा।”

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नीतिवचन 1:28 (HINIRV) »
उस समय वे मुझे पुकारेंगे, और मैं न सुनूँगी; वे मुझे यत्न से तो ढूँढेंगे, परन्तु न पाएँगे।

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