Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52



यिर्मयाह 35:1 का सीधा अर्थ
यह वचन बताता है कि यहोवा की ओर से यिर्मयह के समय यहोदा के राजकुमार योशिय्याह के पुत्र यहूयाकीम के राज्य में एक विशेष पवित्र संदेश पहुँच रहा है। सरल शब्दों में, परमेश्वर ने एक विशिष्ट वाचा और परीक्षण के लिए मैलिक परिवार को बुलाया ताकि वे अपनी आस्तीनों में सचाई के असूल को दिखायें।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यिर्मयाह—प्रमुख नबी—राजाओं और चक्रीय राजनीतिक परिस्थितियों के समय परमेश्वर के संदेश को पंक्तिबद्ध करते हैं। यहाँ यहूदा के राजा यहोयाकीम का उल्लेख है; यहूदा के राजवंश और यरूशलेम की स्थिति उस समय अस्थिर थी। यह वचन एक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में आता है जब परमेश्वर अपने चुने हुए लोगों के साथ अपने निष्ठा-बोध और सिद्धता की मांग करते हैं।
धार्मिक-आध्यात्मिक संकेत
मुख्य अभिप्राय के पक्ष
यह वचन यह दर्शाता है कि परमेश्वर की ओर से संदेश आना सामान्य नहीं है; वह विशेष अवसरों पर आत्मा के प्रकाश से देखते-परखे लोगों तक पहुँचाते हैं। संदेश यह है कि भय और आस्तीनों के भीतर सत्य के अनुरूप जीवन जीना परमेश्वर के उद्देश्य का हिस्सा है, भले ही बाहरी सत्ता बदलती रहे।
थीमैटिक बिंदु
क्रॉस-रेफरेंस (संक्षेप में व्याख्या)
यिर्मयाह 18:7-8 में परमेश्वर कहते हैं कि जो बोलते हैं, वे उनके मनमानी नहीं बल्कि परमेश्वर की योजना के अनुसार हैं; अगर लोग परिवर्तन न करें, तो दंड हो सकता है। इससे यह सीखा जा सकता है कि परमेश्वर के संदेश पर आनाकानी से परिणाम घटित होते हैं। नोट: यहाँ विस्तृत पाठ उद्धृत नहीं किया गया है—केवल संकेतस्थल का संज्ञान।
यिर्मयाह 36:2-3 में नबी का संदेश स्पष्ट होता है कि शब्दों के द्वारा राजाओं और लोगों को आचरण के परिवर्तन के लिए आह्वान किया जाता है। हमारी समझ में यह आता है कि धार्मिक नेतृत्व और आम जनता दोनों के लिए सत्य की आवाज़ आवश्यक है।
यिर्मयाह 29:11-13 में यह दिखता है कि परमेश्वर अपने लोगों के कल्याण की योजनाओं के साथ रहते हैं और लोग उनकी खोज में सच्चे दिल से आ सकें तो वे उन्हें पाएंगें।
संक्षिप्त व्यावहारिकTakeaway
सारांश
यिर्मयाह 35:1 के इस संदेश में हमें यह सिखाया गया है कि परमेश्वर अपनी योजना के अनुरूप अपने दूतों के माध्यम से अपने लोगों तक पवित्र चेतावनी और प्रेरणा पहुँचाते हैं। यहूदा के राजघराने के संदर्भ में यह दिखाता है कि बाहरी सत्ता चाहे कितनी भी स्थिर क्यों न हो, नैतिकता और श्रद्धा की दीवारें टूटनी नहीं चाहिए। यिर्मयाह के कार्य में यह स्पष्ट है कि परमेश्वर की बात सुनना और उसे मानना ही परम उपलब्धि है।
यह पाठ HINIRV अनुवाद में प्रस्तुत किया गया है। केवल आवश्यक उद्धरण माने गए हैं; नीचे के पंक्तियों में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के विश्लेषण से अनुरूप छोटे संकेत सम्मिलित हैं।