Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 3:1 — संक्षिप्त अर्थ
यह पद यह बताता है कि यहोवा अपनी प्रजा के विश्वासघात पर कितनी दृष्टि से देख रहा है। घृणित विवाह-व्यवहार के कारण यह देश अशुद्ध हो गया है, और फिर भी वह प्रेमिका की ओर वापस लौटना चाहता है—परन्तु यहोवा कहता है कि पूर्व सम्बन्ध छोड़कर लौटना संभव नहीं है जब तक परिवर्तन नहीं होता।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यिर्मयाह की किताब एक ऐसा समय प्रस्तुत करती है जब यहूदा ईनाम-आशाओं के पीछे अटल रहा, परन्तु यहोवा के प्रति अविश्वास और गलत आध्यात्मिक प्रथाओं ने उसकी नैतिक धार को खो दिया था। यह पद उस समय की स्थिति को उभारता है जहाँ इस्राएल-यिर्मयाह के समय में भी "व्याभिचार" जैसी सामाजिक-आर्थिक असमानताएँ और धर्म-व्यवस्था के प्रति पापचलन उभर रहा था। यहोवा यह कहकर स्मरण कराते हैं कि वे अपनी पत्नी के रूप में अपने लोगों के साथ धोखा ही नहीं, बल्कि पुनः बुलाने के लिए भी तैयार रहते थे, परन्तु यह पुनरागमन सचमुच दिल से परिवर्तन पर निर्भर है।
विश्लेषणात्मक बिंदु
कथन के बुनियादी संदेश
यिर्मयाह यहूदियों को याद दिलाते हैं कि वैवाहिक और आध्यात्मिक प्रतिबद्धता में निरंतरता आवश्यक है। प्रेमियों के साथ बहकना अस्थिर और षड्यंत्र-पूर्ण है; परन्तु अगर करोड़ों बार धोखा देने के बाद भी एक सच्चे परिवर्तन की इच्छा हो, तो यहोवा-पथ पर वापसी संभव है—पर वह हृदय के परिष्कार के बिना नहीं है।
संबद्ध दृष्टान्त और क्रॉस-रेफरेंस
1) यहश 54:5-6 — प्रभु आपको विवाह-बंध और विश्वास के पुनर्निर्माण के लिए आह्वान करते हैं; धोखे के बाद भी वह दयालुता से पुकारते हैं कि आपका परमेश्वर वापस आए।
2) होशया 2:14-16 — विवाह-प्रतीक के माध्यम से परमेश्वर इस्राएल के साथ पुनः संबंध स्थापित करने की इच्छा व्यक्त करते हैं; यह पथ-पथिक प्रेम की पुनर्स्थापना को दर्शाता है।
3) यिर्मयाह 3:22 — “हम वापस लौटेंगे” का आह्वान और पाप से पलटकर ईश्वर की ओर लौटने की प्रेरणा—यही यहाँ मुख्य ध्येय है।
निचोड़ता निष्कर्ष
यह वाक्य यह दर्शाता है कि नैतिक और आध्यात्मिक विराम के बिना सुधार संभव नहीं। यहोवा की करुणा और दया स्पष्ट है, परन्तु वापसी के लिए सचेत और दिल से परिवर्तन आवश्यक है। व्यवहार में यह कहता है कि विश्वास और निष्ठा से चलना ही ईश्वरपुरुषार्थ की सच्ची वापसी है।
छोटा प्रयोगात्मक मार्गदर्शन
शब्द सार भर्ती (संश्लेषित)
यहाँ यह स्पष्ट है कि विश्वासघात के बाद भी परमेश्वर अपने लोगों से सम्पूर्ण आत्म-स्वीकृति की उम्मीद रखते हैं। यह पुराने से नया मार्ग खुलवाने की राह है—जब मन से लौटे और पथ-परायण रहें।
उद्धृत प्रमाण: इस टिप्पणी में Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के एक-एक पंक्ति-उद्धरण सीधे नहीं दिए गए हैं; जहां उपयुक्त उक्ति मिलती है, वहां छापा गया है।