Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 3:17 पर टिप्पणी: क्यों यह वाक्य मायने रखता है
यिर्मयाह 3:17 का वचन यह बताता है कि भविष्य में यरूशलेम एक बार फिर 하나님 के आधिपत्य के साथ जुड़कर एक आधिकारिक केन्द्र बन जाएगी, जहाँ सब जातियाँ मेरे नाम के निमित्त इकट्ठी होंगी और उन कीर्ति-हठ से वे अपनी निर्भर्ता से पीछे हटेंगी। यह संदेश केवल एक भौगोलिक पुनःस्थापन से अधिक है; यह आध्यात्मिक परिवर्तन और लोगों के बीच ईश्वर के शासन की मान्यता की कल्पना है। यह वचन भविष्य-उद्धार की आशा को प्रकट करता है कि दुनिया की विभाजनकारी पंक्ति ”यहूदी बनाम गैर-यही” दूर होगी और समस्त राष्ट्र परमेश्वर के सामने एक ही मान सम्मान के साथ आएंगे।
प्रमुख संदर्भ और मूल संदर्भ
यह शास्त्र यिर्मयाह के दिनों में चल रहे राष्ट्र-धर्म-व्यवस्था के संकट के बीच लिखा गया था। यरूशलेम उस समय पाप और असंतोष की स्थिति में था; परमेश्वर अपने लोगों को न केवल दंड देता है, बल्कि नवीनीकरण का भी वादा करता है। इस आशीर्वचन में भविष्य की एक ऐसी राजधानी और सभा का तात्पर्य है जहां सारे लोग शांति और विधि के साथ एकजुट होंगें। यह संदेश ईश्वर के राज्य की सार्वभौमिकता और सत्य की मान्यता पर केंद्रित है।
मुख्य संदेश
आध्यात्मिक चित्रण और समेकित बिंदु
यह verse एक शानदार विश्वास-चित्र प्रस्तुत करता है कि परमेश्वर का शासन एकेश्वर के रूप में हर भाषा-जाति तक फैलेगा। यरूशलेम का उल्लेख एक पवित्र स्थल के रूप में होता है, जहाँ सब कुछ ईश्वर के नाम के साथ जुड़ता है। यह संदेश न्यू टेस्टामेंट के विश्व-व्यापी मिशन के साथ संगत है—यहीं से ईश्वर के वंशजों के बीच एकजुटता और शांति की स्थापना होती है।
क्रॉस-रेफरेंसेस और उनके छोटे-से स्पष्टीकरण
- मती 28:19-20 (विश्व-युग में प्रचार-प्रसार का आदेश) के साथ यह मिलकर दिखाता है कि समस्त राष्ट्र कैसे मसीह के नाम के निमित्त एकत्र होते हैं।
- इसाय 2:2-4 (स्थायी शांति और सभ्यता का दृश्य) बतलाता है कि राष्ट्रों के बीच न्याय और शांति का युग कैसे आरम्भ होगा।
- एप्प्लाइड फ्यूचर-हेरिटेज के रूप में लूका 24:47 (विश्व-सेवा का संदेश) इस तथ्य को पुष्ट करता है कि सभी जातियाँ ईश्वर के प्रतिपादन में भागीदारी करेंगी।
हार्दिक देवotional विचार
उच्चतम शासन के सामने व्यक्ति अपने हृदय की कठोरता छोड़ दे—यह आज के समय के लिए भी एक चुनौती है। क्या हम अपने जीवन के नियंत्रण को ईश्वर के हाथों में सौंपते हैं, ताकि उनके नाम के निमित्त हमारे घर-परिवार-संस्थागत संरचना में एकता और विनम्रता स्थापित हो सके? परमेश्वर यदि सबके बीच एकता बनाता है, तो हमारी呼-ध्यान में भाइयों-बहनों के प्रति करुणा और न्याय का आवाज़ उठती है।
संक्षिप्त निष्कर्ष
यिर्मयाह 3:17 हमें यह स्मरण कराता है कि परमेश्वर का राज्य सभी जातियों के लिए खुला और स्वागतयोग्य होगा, जहां यरूशलेम परम नाम के निमित्त एक केंद्र बना रहेगा और लोग अपनी बुरे मन की हठ से मुक्त होकर उसकी इच्छा के अनुसार चलेंगे। यह स्पष्ट दृढ़ता है कि ईश्वर का मार्ग सर्वोपरि है और उसका राज्य विश्वभर में स्थापित होने वाला है।
महत्वपूर्ण टीकाकार उद्धरण (चयनित):
Matthew Henry: "The Lord shall be king in Jerusalem, and the nations shall come to worship Him." (संक्षिप्त सार)
Albert Barnes: इस वचन में ईश्वर के घर के रूप में यरूशलेम की प्रतिष्ठा और जातियों की एकता स्पष्ट होती है, जो धर्म-निष्ठा और शासन-न्याय के संतुलन की प्रतिपादन है।
Adam Clarke: यह भविष्यवाणी एक ऐसी काल-सीमा को संकेत देती है जिसमें परमेश्वर की महिमा सभी राष्ट्रों में प्रकट होगी और पाप के हठ को छोड़ा जाएगा।