Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 3:9का सीधे अर्थ
यह पद बताता है कि इजरायल की शासन-विधि और व्यवहार में व्यभिचार ने देश को निष्कर्षतः अशुद्ध बना दिया। कारण वह अपनी निर्लज्ज-व्यभिचारिणी-सी पाश्चात्य-निष्ठा से दूर होकर, पत्थर, लकड़ी और नगर-देवताओं के साथ भी गहरा अपराधात्मक संबंध बनाती है। निष्कर्षतः परमेश्वर की वाचा के अनुरूप रहने में कमी आई और राष्ट्र की पवित्रता ढह गई।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यिर्मयाहघ के समय में ईश-चेतना के विरुद्ध बहुधा चिन्तन और कार्य चल रहे थे। नबियों की चेतावनियाँ अस्वीकार कर, आचरण में व्यभिचार और कपट-धर्म का शासन हुआ था। यहाँ “ निर्लज्ज-व्यभिचारिणी” से राज्य और समाज की नैतिक गिरावट चित्रित होती है—जब लोग परमेश्वर के प्रेम और सत्य से हटकर समाजी-धर्म के नाम पर असत्य और अनैतिकता अपनाते हैं।
व्याख्यात्मक बिंदु
संघर्षपूर्ण टिप्पणियाँ (प्रमुख विद्वानों के अनुरूप सार)
Matthew Henry के अनुसार यह दृश्य-चित्र परमेश्वर की सच्ची धर्म-निष्ठा के विरोध में समाज की गिरावट को दर्शाता है; दमन और वैमनस्य के बीच नैतिक भागीदारी की स्पष्ट चेतावनी है. Albert Barnes स्मरण दिलाते हैं कि मूर्तिपूजा यहूदियों के दिल के पतन का बाहरी प्रमाण है. Adam Clarke व्यभिचार को केवल शारीरिक नहीं बल्कि आध्यात्मिक अपमान भी मानते हैं, जो राष्ट्र की साक्षात्-धार्मिक स्वयंसेवा को चोट पहुँचाती है.
संक्षिप्त प्रमुख विचार
अन्य सम्बद्ध संदर्भ
1) यिर्मयाह 2:26–28 — राष्ट्र की मूर्ति-पूजा और आत्म-घुनचितापर जोर; यह भी निकृष्ट प्रभावों को दर्शाता है।
2) यिर्मयाह 7:9–10 — पाप के कारण देव-सम्बन्ध-शिथिलता और परलोक-भय की कमी का प्रवचन।
3) रोम 1:21–23 — मानव की बुद्धि के अंधकार में देव-स्वीकृति के अभाव का आधुनिक-समय सन्निधान।
व्यावहारिक निष्कर्ष
नैतिक आचरण की रक्षा में ईश्वर-आशय का अन्वेषण ज़रूरी है। व्यक्तिगत सत्यनिष्ठा और सामाजिक धर्म-व्यवस्था के बीच संतुलन बनाकर ही समाज की पवित्रता लौट सकती है। इस पद से प्रेरणा लें कि परमेश्वर के साथ निष्ठा बनाकर चलना है, न कि सांसारिक-धर्म से बनी आडंबर-रचना।
पाठ के मुख्य उद्धरण का उल्लेख: Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के संकलन में दिखाई गई विचारधाराओं के अनुसार, व्यभिचार के सामाजिक-धार्मिक दुष्प्रभाव स्पष्ट हैं और इनसे उबरने के लिए आत्म-नियमन और ईश-निष्ठा आवश्यक है.