Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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संदर्भ-सारांश
यिर्मयाह 2:27 में भविष्यद्वक्ता उस्राएल की धार्मिक हठधर्मिता और मूर्तिपूजा की निन्दा कर रहा है। पुराना अनुबंध में परमेश्वर ने उनकी सुरक्षा और मार्गदर्शन का वादा किया, पर वे निर्जीव काठ-पत्थर की ओर मुड़कर सहायता माँगते हैं। आयत पूरी घोषणा के प्रवाह में एक व्यंग्यपूर्ण तसलीम दिखाती है: मूर्तियों ने उनकी ओर “मुँह नहीं” फेरा हुआ है, पर विपदा में वे उनसे बचाव की उम्मीद करते हैं — यह उनकी आध्यात्मिक अंधता और परलोकीन आश्रयों की विडंबना को उजागर करता है।
मूल अर्थ
यह वाक्यांश प्रतीकात्मक है: काठ और पत्थर मूर्ति-देवताओं का प्रतिनिधित्व करते हैं जो न बोल सकते, न सुन सकते, न समझ सकते। यिर्मयाह बतलाता है कि लोग सच में परमेश्वर से मुंह फेर चुके हैं; फिर भी विपत्ति में उसी निर्जीव वस्तु से सहायता मांगते हैं। कुल मिलाकर यह ईमानदारी की कमी और असल भरोसे के अभाव का आरोप है।
मुख्य विषय
संबंधित शास्त्रस्थल
यहोशुआ 24:23—जहाँ पुनः यह चेतावनी है कि मूर्तियों पर भरोसा रखना मूर्त विश्वास है; यहाँ यिर्मयाह की निन्दा की तरह पश्चाताप और लोक विश्वास का प्रश्न उठता है।
इसाïया 44:9–20—इसी विषय पर विस्तृत व्यंग्य मिलता है जहाँ मूर्ति बनाने वालों की मूर्खता को दर्शाया गया है; दोनों ग्रंथ मूर्तियों की अनुपयोगिता पर जोर देते हैं।
संग्रहित उपदेशक 5:1–7—यहाँ भी अनुचित आशा और असत्य आश्रयों की विफलता की बात आती है; संकट में जो सहारा नहीं दे सकता, उस पर आशा व्यर्थ है।
व्यावहारिक चिंतन
आधुनिक पाठक के लिए यह आयत हमें आत्म-परीक्षण करने को कहती है: किन बातों पर हम अपना भरोसा रखते हैं—धन, प्रतिष्ठा, तकनीक या परंपरागत अनुष्ठान? संकटों में हमारी पहली प्रतिक्रिया क्या होती है? इस पाठ से प्रेरणा मिलती है कि हम अपनी आशा को जीवित, जान्ने वाले परमेश्वर पर केन्द्रित करें, न कि असंवेदनशील साधनों पर।
प्राचीन टिप्पणी से उपयोगी उद्धरण
मैथ्यू हेनरी ने इस आयत के भाव पर लिखा है: "मनुष्य अक्सर निर्जीव वस्तुओं से उस सहायता की अपेक्षा रखते हैं जो केवल जीवित ईश्वर ही दे सकता है।" यह संक्षेपिक वाक्यांश मूल अर्थ को संक्षेप में पेश करता है। (सूत्रों में स्वतंत्र संदर्भ के रूप में उद्धृत)
संक्षेप
यिर्मयाह 2:27 हमें दिखाता है कि जब लोग ईश्वर से मुंह फेरते हैं, तब भी वे विपत्ति में गलत आश्रयों की ओर भागते हैं। आयत चेतावनी है कि केवल जीवित परमेश्वर ही भरोसा और रक्षा दे सकता है; अन्य सभी सहारे असफल सिद्ध होंगे। इस पाठ का आज का संदेश स्पष्ट है: हमारा भरोसा किस पर है और संकटों में हमारी प्रार्थना किनके पास जाती है, यह हमारी आध्यात्मिक स्थिति की असल झलक है।