Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 2:21 — संदर्भ और अर्थ
यिर्मयाह के समय ईश्वर का निवेदन एक करुणामय कोसिस है—यह परमेश्वर की नज़र सेति दाखला है जो उसने इस्राइल के लिए किया था। संदर्भ में यहूदियों के पथ में असफलता, उनकी आस्था में टेढ़ापन, और ईश्वर के साथ उनके संबंध में असंतुलन उजागर होता है। यह वचन कहता है कि लगभग पहले से दी गई भर्ती, संरचना और आशीर्वाद कैसे “उत्तम जाति की दाखलता” और “उत्तम बीज” के रूप में स्थापित थे, परन्तु इस्राइल ने उन्हें त्याग कर जंगली दाखलताओं (अपवाद और बुरे फलों) की ओर रुख किया।
Immediate setting
यिर्मयाह 2 में परमेश्वर अपने भविष्यद्वक्ता के माध्यम से इस्राइल के लिए एक चौंकाने वाला प्रश्न प्रस्तुत करते हैं: किसने तुमको इस प्रकार जाँचने पर मजबूर किया कि तुम जंगली दाखलताओं बन गए? यह बताता है कि परमेश्वर ने उनके लिए एक स्पष्ट, संरचित और लाभकारी मार्ग निर्धारित किया था, परन्तु वे उस मार्ग से भटक गए।
गहरे पाठ से क्या सीखते हैं
यह पाठ ईश्वर की पवित्र and स्थिरता की मांग को दर्शाता है। परमेश्वर अपने चयनित लोगों के साथ एक विशिष्ट संबंध रखना चाहते थे—एक भरोसेमंद, उत्पादक और धर्मी जीवन। जब Israel ने उस बुलाहट को ठुकराया, तो दुष्ट प्रवृत्तियों के कारण उनके भीतर उभरते संकेत, अर्थात् जंगली दाखलता, प्रकटन करते हैं।
महत्वपूर्ण शब्दों और उदाहरणों की व्याख्या
क्रॉस-रेफरेंसेस और उनका संक्षिप्त अर्थ
1) स्मरण: यिर्मयiah 2:5 — यह बताता है कि इस्राइल क्यों निराश हुआ: उन्होंने परमेश्वर की वचनों के पीछे नहीं चले।
2) इजिप्त상: प्रेषित 3:14-15 — परमेश्वर का आह्वान एक ही लक्ष्य के लिए है: विश्वास और आस्था का उचित पथ।
3) निर्माण: एब्राहीम और डेर: चयनित लोग कैसे विशेष बुलाहट के साथ जुड़े रहते हैं और फल प्रदान करते हैं।
प्रेरक संदर्भ
यीशु के ग्रंथीय संदर्भ में यह संदेश प्रत्यक्ष है: परमेश्वर हमारे हृदय की स्थिति देखता है—जो उम्मीद और नैतिकता की पथ पर हो, वही वास्तविक आशीष पाता है। साथ ही, यह भी बताता है कि पथभ्रष्टता के बावजूद ईश्वर का वादा और समर्पण स्पष्ट है—उचित परिवर्तन और पश्चाताप से मार्ग वापस पाया जा सकता है।
आज के लिए अनुप्रयोग
- अपने जीवन में इस्राइल के इतिहास से सीख लें: चुने हुए पथ पर रहने के लिए उद्धार और आस्था को बनाए रखें।
- न कि दिखावे पर, बल्कि आंतरिक परिवर्तन और निष्ठा पर जोर दें।
- गलत प्रवृत्तियों की जगह ईश्वर के उत्तम बीज को हथियार बनाकर, विश्वास, नैतिकता और प्रेम के फल प्रस्तुत करें।
यिर्मयाह 2:21 के इस ब verse में हम देखते हैं कि परमेश्वर ने जो कुछ दिया वह पर्याप्त था—परन्तु मानव हृदय की दशा के कारण वह “जंगली दाखलता” बन गया। यह कटाक्ष नहीं, बल्कि धैर्यपूर्वक बुलाहट है कि हम अपनी आस्था और आचरण सुधारें ताकि हमारी जिंदगी ईश्वर की उत्तम योजना के अनुरूप फल दें।
संदर्भ उद्धरण (सारांश): Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के टिप्पणी-उद्धरण आवश्यक स्थान पर शामिल किए गए हैं। इनपुट में किसी भी विशिष्ट पूर्ण पवित्रशास्त्रीय पाठ को यहाँ दोहराया नहीं गया; केवल उनके विचारों के संकलन से एक एकीकृत समाधान प्रस्तुत किया गया है।