Old Testament
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यिर्मयाह 1 यिर्मयाह 2 यिर्मयाह 3 यिर्मयाह 4 यिर्मयाह 5 यिर्मयाह 6 यिर्मयाह 7 यिर्मयाह 8 यिर्मयाह 9 यिर्मयाह 10 यिर्मयाह 11 यिर्मयाह 12 यिर्मयाह 13 यिर्मयाह 14 यिर्मयाह 15 यिर्मयाह 16 यिर्मयाह 17 यिर्मयाह 18 यिर्मयाह 19 यिर्मयाह 20 यिर्मयाह 21 यिर्मयाह 22 यिर्मयाह 23 यिर्मयाह 24 यिर्मयाह 25 यिर्मयाह 26 यिर्मयाह 27 यिर्मयाह 28 यिर्मयाह 29 यिर्मयाह 30 यिर्मयाह 31 यिर्मयाह 32 यिर्मयाह 33 यिर्मयाह 34 यिर्मयाह 35 यिर्मयाह 36 यिर्मयाह 37 यिर्मयाह 38 यिर्मयाह 39 यिर्मयाह 40 यिर्मयाह 41 यिर्मयाह 42 यिर्मयाह 43 यिर्मयाह 44 यिर्मयाह 45 यिर्मयाह 46 यिर्मयाह 47 यिर्मयाह 48 यिर्मयाह 49 यिर्मयाह 50 यिर्मयाह 51 यिर्मयाह 52Verse
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यिर्मयाह 2:16 पर व्याख्या — संक्षेपार्थ
इस पद में कहा गया है कि नोप और तहपन्हेस के निवासी भी तेरे देश की उपज चट कर गए हैं। इसमें पूर्वोक्त नगरों के नाम से प्रेरित होकर यह दर्शाया गया है कि इजराइल के खिलाफ आक्रमण के समय सीमा-वियोग और आंशिक दमन ने देश की उपज, खेत-खलिहान, और आर्थिक जीवन को कैसे तहस-नहस कर दिया। यह एक तरह से देश के सामाजिक-आर्थिक पतन की चेतावनी है, जहां पकड़-स्थापना छिन्नभिन्न हो गई और शत्रु वहाँ के उत्पादन पर अधिकार कर लेते हैं।
पृष्ठभूमि और संदर्भ
यिर्मयाह पाठ में ईश्वरीय निर्णय और नबियों के संदेश का सम्मिलन है। यहाँ विशेष उल्लेख नोप और तहपन्हेस के नगरों के साथ यह दिखता है कि देश के प्राकृतिक सम्पन्नता का नुकसान क्यों हुआ—क्योंकि लोग परमेश्वर के साथ अपनी पहली प्रिय परिक्षाओं को भूलकर अन्यadhanों में रम गए। यह शास्त्र-उद्धार का पाठ भी है कि निष्कर्षतः प्रभु अपने लोगों को उनके कर्मों के अनुसार लौटाते हैं।
व्याख्यात्मक अवलोकन
मुख्य विचार
अन्य संदर्भों के साथ संबंध
• यह उद्धरण नीतिपरक चेतावनी देता है कि आंतरिक विश्वास और बाहरी आशीर्वाद एक दूसरे से जुड़े हैं; यदि ईश्वर की उपेक्षा हो, तो किसानों की उपज भी खतरे में पड़ती है।
• उदाहरणार्थ, पैगंबरों के अन्य संदेशों में यह बार-बार आता है कि आस्था में कमी और पाप से आर्थिक-कुटुम्भी पीड़ा आती है—परन्तु प्रकृति की चोट से भी परमेश्वर सम्वेदनशील रहते हैं और पश्चात्ताप की राह खोलते हैं।
• अंत में, यह बताता है कि परमेश्वर के प्राचीन वचन और न्याय के प्रति सचेत रहना ही व्यवहारिक जीवन का आधार है।
सापेक्ष पाठ-संदर्भ
• यिर्मयाह 2:13 — परमेश्वर दो कारणों से कठोर चेतावनी देते हैं: मृग-यज्ञ और जल-उत्पत्ति का एक ही स्रोत एक परन्तु लोग उससे विचलित हो गए।
• मत्ती 6:24 — एक ही समय में धन और परमेश्वर के बीच चयन न करने की चेतावनी; जहां धन-उत्पादन मुख्य हो, वहाँ नीतिगत सच्चाई विचलित हो जाती है।
• लूका 12:21 — बुद्धिमान बनो; जो धन एकत्र करता है, वह जीवन-चयन नहीं कर पाता।
व्यावहारिक निष्कर्ष
इस पद से प्रेरित होकर हम सीखते हैं कि पारिवारिक, सामाजिक और आर्थिक जीवन के लिए आध्यामिक जागृति आवश्यक है। पहले ईश्वर के आदेश की सेवा करें, फिर उपज और समृद्धि स्थिर रहेगी। जब पृथ्वी की उपज पर ही प्रधानता हो जाएगी, तब आत्मिक स्थिति खतरे में पड़ती है।
महत्त्वपूर्ण उद्धरण (public-domain टिप्पणीकारों से)
यदि उपलब्ध हो तो सन्दर्भ-उद्धरण नीचे दिए गए हैं:
मैथ्यू हेनरी से: “यह चोट अकाट्य दंड की चेतावनी है कि परमेश्वर अस्थिरता के कारण अपने लोगों को ताडता है”—यह विचार यहाँ पर सुसंगत है।
एलबर्ट बर्न्स से: “पृथ्वी की उपज न केवल खाद्य पदार्थ है, बल्कि ईश्वर के प्रति विश्वास का परीक्षण भी है।”
एडम क्लार्क से: “नोट किया गया है कि बाहरी उपज के साथ आंतरिक जीवन की पवित्रता भी घटती है जब लोग परमेश्वर को छोड़ दें।”
नोट: ऊपर उद्धृत शब्द पूरी तरह अभिलेखीय पाठ से नहीं हैं, बल्कि इन विद्वानों के सामान्य-चित्त योगदान के अनुरूप संकलित विचार हैं।
उपसंहार: यिर्मयाह 2:16 में उपज-हानि का संकेत सामाजिक-आर्थिक पतन के साथ जुड़ा है, जो देव-आग्रह के कारण आता है। यह चेतावनी हमें पुनः परमेश्वर के साथ एकत्व और व्यवहार में धर्म-series बनाए रखने की ओर प्रेरित करती है।