Old Testament
उत्पत्ति निर्गमन लैव्यव्यवस्था गिनती व्यवस्थाविवरण यहोशू न्यायियों रूत 1 शमूएल 2 शमूएल 1 राजाओं 2 राजाओं 1 इतिहास 2 इतिहास एज्रा नहेम्याह एस्तेर अय्यूब भजन संहिता नीतिवचन सभोपदेशक श्रेष्ठगीत यशायाह यिर्मयाह विलापगीत यहेजकेल दानिय्येल होशे योएल आमोस ओबद्याह योना मीका नहूम हबक्कूक सपन्याह हाग्गै जकर्याह मलाकीChapter
यशायाह 1 यशायाह 2 यशायाह 3 यशायाह 4 यशायाह 5 यशायाह 6 यशायाह 7 यशायाह 8 यशायाह 9 यशायाह 10 यशायाह 11 यशायाह 12 यशायाह 13 यशायाह 14 यशायाह 15 यशायाह 16 यशायाह 17 यशायाह 18 यशायाह 19 यशायाह 20 यशायाह 21 यशायाह 22 यशायाह 23 यशायाह 24 यशायाह 25 यशायाह 26 यशायाह 27 यशायाह 28 यशायाह 29 यशायाह 30 यशायाह 31 यशायाह 32 यशायाह 33 यशायाह 34 यशायाह 35 यशायाह 36 यशायाह 37 यशायाह 38 यशायाह 39 यशायाह 40 यशायाह 41 यशायाह 42 यशायाह 43 यशायाह 44 यशायाह 45 यशायाह 46 यशायाह 47 यशायाह 48 यशायाह 49 यशायाह 50 यशायाह 51 यशायाह 52 यशायाह 53 यशायाह 54 यशायाह 55 यशायाह 56 यशायाह 57 यशायाह 58 यशायाह 59 यशायाह 60 यशायाह 61 यशायाह 62 यशायाह 63 यशायाह 64 यशायाह 65 यशायाह 66



यशायाह 26:16 — उद्धरण का संदर्भ और आत्मिक अर्थ
हे परमेश्वर, दुःख के समय में यहोवा को याद करते थे; उन पर ताड़ना पड़ते समय वे दबे स्वर से अपने मन की बात वह कहते थे। यह वचन तत्कालीन संदर्भ में एक पीड़ित राष्ट्र के कहने की अनुभूति को दर्शाता है कि जब उन्हें कटौती और दुष्कर परिस्थितियाँ आतीं, तब वे परमेश्वर की स्मृति और न्याय को याद करते थे, परन्तु आंतरिक आर्तनाद के साथ।
पाठ का तात्त्विक खुलासा: परमेश्वर और विश्वास की प्रस्तुति
この वाक्यांश में दिखता है कि प्रत्यक्ष दुःख के बीच लोग परमेश्वर के सच्चे न्याय और कृपा को याद करते हैं। वे दबे स्वर से अपनी मन की बात व्यक्त करते हैं, यानी विनम्रता, कर्तव्य-बोध और आह्वान—जो कि विश्वास के मूल तत्व हैं: परमेश्वर से छिपे मन की बातें कहना और उसकी समय-सारिणी में विश्वास बनाए रखना। इस प्रकार परमेश्वर के साथ विश्वास-बंध बना रहता है, भले ही परिस्थितियाँ कष्टदायक हों।
महत्वपूर्ण शब्दों और छवियों की स्पष्टता
संबद्ध मार्गदर्शक पवित्रग्रंथ
यह भाग निम्न संदर्भों से नयी दिशा प्राप्त करता है—पहचान और आश्वासन के साथ:
ये संदर्भ बताते हैं कि परमेश्वर हमारे दुःख में भी सक्रिय रहते हैं—न सिर्फ निर्णय देते, बल्कि संबंध को प्रगाढ़ करते हैं—जब हम उनसे नजदीकी में आते हैं।
प्रमुख विचारों के लिए संक्षिप्त निष्कर्ष
- दुःख के समय ईश्वर को याद रखना और उनसे सच्ची प्रार्थना करना आवश्यक है।
- ताड़ना को प्रेममय सुधार के रूप में पहचानना चाहिए, ताकि आन्तरिक परिवर्तन संभव हो।
- दबे स्वर से प्रकट की गई बातें ईश्वर के साथ ईमानदार संवाद का प्रतीक हैं; इसका उद्देश्य विश्वास को और प्रगाढ़ करना है।
आज के संदर्भ में व्यावहारिक अनुप्रयोग
एतिहासिक-विश्वासीय उद्धरण (संक्षेप)
मथ्यूHENRY, ऐल्बर्ट बर्न्स, एडम क्लार्क के सार्वजनिक-डायरी-शैली टिप्पणियाँ इन भावनाओं के पैटर्न को स्पष्ट करती हैं: कष्ट के समय मनुष्य अपने आप को ईश्वर के चरणों में ढालते हैं, और ईश्वर के विवेक से अपनी राह तलाशते हैं। यदि आवश्यकता हो, तो आप इन टिप्पणीकारों के विचारों से संबंधित पंक्तियाँ देख सकते हैं जहाँ उन्होंने प्रार्थना, सज़ा और पुनर्स्थापन की त्रुटिपूर्णता पर प्रकाश डाला है।
नोट: नीचे केवल हकीकत में उद्धृत भागों के कारण स्पष्ट शब्द-रेखा दी गयी है; पूर्ण ग्रंथ-उद्धरण नहीं दिया गया है।