Old Testament
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यशायाह 1 यशायाह 2 यशायाह 3 यशायाह 4 यशायाह 5 यशायाह 6 यशायाह 7 यशायाह 8 यशायाह 9 यशायाह 10 यशायाह 11 यशायाह 12 यशायाह 13 यशायाह 14 यशायाह 15 यशायाह 16 यशायाह 17 यशायाह 18 यशायाह 19 यशायाह 20 यशायाह 21 यशायाह 22 यशायाह 23 यशायाह 24 यशायाह 25 यशायाह 26 यशायाह 27 यशायाह 28 यशायाह 29 यशायाह 30 यशायाह 31 यशायाह 32 यशायाह 33 यशायाह 34 यशायाह 35 यशायाह 36 यशायाह 37 यशायाह 38 यशायाह 39 यशायाह 40 यशायाह 41 यशायाह 42 यशायाह 43 यशायाह 44 यशायाह 45 यशायाह 46 यशायाह 47 यशायाह 48 यशायाह 49 यशायाह 50 यशायाह 51 यशायाह 52 यशायाह 53 यशायाह 54 यशायाह 55 यशायाह 56 यशायाह 57 यशायाह 58 यशायाह 59 यशायाह 60 यशायाह 61 यशायाह 62 यशायाह 63 यशायाह 64 यशायाह 65 यशायाह 66



यशायाह 26:15 — पाठ का पृष्ठभूमि और अर्थ
परन्तु तूने जाति को बढ़ाया; हे यहोवा, तूने जाति को बढ़ाया है; तूने अपनी महिमा दिखाई है और उस देश के सब सीमाओं को तूने बढ़ाया है।
पृष्ठभूमि और immediate setting
यशायाह ने तब के समय की पवित्र योजना और यहूदा के भविष्य की आशाओं को उजागर किया है। यहाँ संसारिक सीमाओं के विस्तार की बातें परमेश्वर की कृपा और राज्य के ढांचे से जुड़ी हुई हैं। बानगी के रूप में, इस पद में यहूदी राष्ट्र के आकार-चौड़ाई की चर्चा है—पर परमेश्वर की महिमा और आशीष के कारण ही यह संभव हुआ। यह उन दिनों की कथा से जुड़ती है जब परमेश्वर अपने लोगों को सुरक्षित रखता है, उन्हें बंधनों से मुक्त करता है और उन्हें ऐसी स्थिति में डालता है जहाँ उनकी भलाई में बढ़ोत्तरी हो।
ईश्वर या विश्वास के बारे में क्या प्रकट होता है
यह वचन दिखाता है कि परमेश्वर एक सर्वव्यापक और महिमान्वित राजमहल खड़ा करने वाला हैं—न केवल रहने के लिए बल्कि उन आशीषों के माध्यम से जो राष्ट्रों के बीच उनकी महिमा को प्रकट करते हैं। यह कहना है कि ईश्वर ने जाति (या राष्ट्र) को बढ़ाया है—यह बढ़ोतरी कोई आत्म-उद्धार नहीं बल्कि उसकी करुणा, वर्चस्व, और सामर्थ्य के कारण है। साथ ही यह विश्वास दिलाता है कि राष्ट्र की सीमा और महिमा परमेश्वर की योजना के अंतर्गत है, न कि मानव आकांक्षा से स्वतंत्र।
महत्वपूर्ण शब्दों और imagery का स्पष्टीकरण
अन्य सम्बन्धित ग्रंथार्थ
यह विचार अन्य उद्धृत भागों से जुड़ता है जो परमेश्वर की कृपा, सुरक्षा और राष्ट्र के लिए उनकी योजना को दर्शाते हैं:
इनत्रुटियों का मिलान शास्त्रीय टिप्पणियों से भी होता है, जैसे कि मॉथ्यू मसी, ऐल्बर्ट बर्न्स और एडम क्लार्क के प्रकाशनों में वर्णित विचार, जो परमेश्वर की योजना और सत्ता को रेखांकित करते हैं।
मौजूदा समय के लिए अनुप्रयोग
हम कैसे इस वचन से सीखें? पहला—परमेश्वर की योजना और उसकी महिमा राष्ट्रों से भी भिन्न नहीं है; हमें भी अपने जीवन में उसकी इच्छा के अनुसार आगे बढ़ना चाहिए। दूसरे—आशीष केवल व्यक्तिगत लाभ नहीं, बल्कि सामूहिक कल्याण के लिए है; समुदाय के लिए सुरक्षा और अवसरों की वृद्धि उसकी कृपा का परिणाम है। तीसरा—भरोसा बनाए रखें कि चाहे परिस्थितियाँ कैसी भी हों, परमेश्वर की सीमा और महिमा का विस्तार होता है, और हम उनके साथ जुड़कर उनके उद्देश्य में भागीदार बनते हैं।
सूक्ष्म cross-references और उनके अर्थ
यशायाह 26:15 से सम्बद्ध अन्य दास-आत्मिक बिंदु:
उद्धृत संदर्भों के संक्षिप्त सूत्र में, पूर्व-उल्लेखित टिप्पणीकारों के विचारों में परमेश्वर की प्रतिफलनशील शक्ति और राज्य-व्यवस्था की महत्ता प्रमुख है; यह पाठ उनके प्रकाश में एक छोड़ देता है: परमेश्वर ही वह स्रोत है जो राष्ट्रों को ऊँचा उठाता है और उसकी महिमा से विश्व में प्रकाश फैलता है।