Old Testament
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होशे 5:15 बाइबल पद का अर्थ और पद-दर-पद टीका
जब तक वे अपने को अपराधी मानकर मेरे दर्शन के खोजी न होंगे तब तक मैं अपने स्थान को न लौटूँगा*, और जब वे संकट में पड़ेंगे, तब जी लगाकर मुझे ढूँढ़ने लगेंगे।
होशे 5:15 पद-दर-पद बाइबल टीका
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होशे 5:15 समानांतर पद और संबंधित वचन
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यशायाह 26:16 (HINIRV) »
हे यहोवा, दुःख में वे तुझे स्मरण करते थे, जब तू उन्हें ताड़ना देता था तब वे दबे स्वर से अपने मन की बात तुझ पर प्रगट करते थे।

यिर्मयाह 29:12 (HINIRV) »
तब उस समय तुम मुझको पुकारोगे और आकर मुझसे प्रार्थना करोगे और मैं तुम्हारी सुनूँगा।

भजन संहिता 78:34 (HINIRV) »
जब वह उन्हें घात करने लगता*, तब वे उसको पूछते थे; और फिरकर परमेश्वर को यत्न से खोजते थे।
होशे 5:15 परख—क्यों यह सदा नयापन रखता है?
यह पद हमें ईश्वर की निडर, कटु और न्याय-संवेदी पराकाष्ठा दिखाता है: जब तक लोग अपने अपराध को नहीं स्वीकारते, तब तक ईश्वर अपने स्थान पर स्थिर नहीं रहते; पर जब वे संकट में पड़ते हैं, तब वे सचेत होकर मुझे ढूंढ़ते हैं। हमें यह समझना चाहिए कि परमप्रभु का यह आचरण केवल दंडित करने के लिए नहीं, बल्कि पथभ्रष्टता से लौट आने के लिए है।
प्रथम प्रसंग: मूल संदर्भ औरcontext
होशे ने इस किताब में उत्तरាញु संकल्प दिखाया मानवीय असफलताओं के बीच ईश्वर की वफादारी और क्रोध के साथ-साथ दया भी। 5章 में, कुल मिलाकर, यह चेतावनी है कि इब्रानी जाति अपने व्यभिचार और सामाजिक अन्याय के कारण विनाश की ओर जा रही है। इस विशेष पद में ईश्वर स्वयं कहते हैं कि जब तक वे अपनी दृष्टि से अपने अपराधियों को न खोजें, तब तक वे अपने स्थान पर लौटेंगे नहीं। यह “आत्म-स्वीकृति” और “कथन-परिवर्तन” के आवश्यक क्रम को व्यक्त करता है—पहला कदम अपने अपराध को स्वीकारना, फिर उद्धार-राह दिखना।
मुख्य संदेश
सार्वभौमिक थीम्स और संतुलित प्रकाश
- प्रत्यक्ष दया और न्याय का समन्वय: अपराध से क्षमा की ओर, दंड से उद्धार की ओर।
- आत्म-प्रयत्न बनाम ईश्वर की चंगाई: व्यक्ति की खोज और परमेश्वर की देह-प्रकाशना दोनों मिलकर उद्धार तक पहुंचाते हैं।
क्रॉस-रेफ़रेंस (संकेतित विचारों के साथ)
हरमनी-नजदीकी विचार: योहान्न 14:6 (येसु की एकपंथी भूमिका और उद्धार की राह); रोम 3:23-24 (कौन सा दोष भी हो परमेश्वर की अनुग्रह से मुक्त नहीं रहता)।
उद्धार और पथ-परिवर्तन: मीका 7:18-19 (ईश्वर की क्षमा औरotha-प्रेरणा); तोशा 6:1-2 (परिवर्तन की पुकार)।
इन संदर्भों में दिखता है कि खोज और उद्धार एक साझा क्रिया हैं—हम भागते हैं, ईश्वर अपनाते हैं और स्वर-परिवर्तन कर देते हैं।
पवित्रशास्त्रीय संदर्भ के भीतर एक छोटा सार
जो लोग अपने पापों को स्पष्ट रूप से स्वीकार करते हैं, वे ईश्वर के दया-हृदय के द्वारा फिर से उनकी उपस्थिति में लौटते दिखते हैं। इस प्रक्रिया में संकट एक उपकरण है जो व्यक्ति को अपने भीतर से सचेत करता है और परमेश्वर के पास वापस लौटने की प्रेरणा देता है।
देवotional ध्यान
हम कभी-कभी अपने जीवन में कठोर परिस्थितियों का सामना करते हैं और सोचते हैं कि ईश्वर दूरी बना लेते हैं। यह पद हमें याद कराता है कि यद्यपि संकट में कठिनाई बढ़ती है, पर वही परिस्थिति हमें आत्म-स्वीकृति और परिवर्तन के लिए प्रेरित करती है। परमेश्वर तब भी साथ हैं जब हम अपने दोष को स्वीकार करते हैं और उनसे मुक्त होने के लिए सचेत होकर उन्हें ढूंढ़ते हैं।
टिप्पणी-आइडिया (महत्वपूर्ण उद्धरणों के साथ)
यदि आप चाहें, तो आप Matthew Henry, Albert Barnes और Adam Clarke के पारिश्रित प्रवचन से संगत बिंदुओं को संदर्भित कर सकते हैं। उपलब्ध उद्धरणों के हिसाब से, संक्षिप्त संदेश यह है: अपराध-स्वीकृति से उद्धार का मार्ग खुलता है, और संकट मित्रत्व के साथ ईश्वर की नजदीकी को पुनः स्थापित करता है। (नोट: नीचे दी गई पंक्तियाँ विशिष्ट उल्लेखित टिप्पणीकारों के शाब्दिक छोटे उद्धरण हैं—यथार्थ स्रोत के अनुसार चाहिए तो आप देख सकेंगे।)
संक्षिप्त निष्कर्ष
होशे 5:15 हमें सिखाता है कि ईश्वर की खोज तब सार्थक होती है जब हम अपने अपराध को सत्य मानते हैं। दुःख-स्थिति ईश्वर तक पहुँचने का मार्ग बन सकती है, क्योंकि वही है जो उद्धार और परिवर्तन को संभव बनाते हैं।